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शाॅपिंग माॅल

शाॅपिंग माॅल एक ऐसी जगह है जहाँ एक ही छत के नीचे बहुत सारे दृश्य एक साथ देखने को मिलते हैं । हर माॅल के दृश्य उस शहर के स्तर के अनुरूप ही होते हैं । छोटे शहरों के माॅल कुछ अलग तरह के और बड़े शहरों के माॅल कुछ अलग तरह के।
माॅल्स के अंदर बदलते हुए फैशन के updates, बनते-बिगड़ते रिश्तों के दृश्य, नव दंपति का उत्साह, उच्च वर्ग का ब्रांड प्रेम, मध्य वर्ग का आनंद, बुजुर्गों का बदलते परिवेश से सामंजस्य और न जाने ऐसे ही कितने दृश्य ।
मैं माॅल में बैठकर अक्सर वहां के परिवेश को पढ़ने की कोशिश करती हूँ । एक दिन सहसा बगल वाली टेबल से आवाज आयी ......Happy birthday to you..... पलट कर देखा तो दो नवयुवतियाँ Birthday सेलिब्रेट कर रही हैं। केक के साथ दो लड़कियाँ...केक काटा...एक दूसरे को गले लगाया...केक खाया और चली गयीं ।
मैं युवा पीढ़ी के इस professional attitude को देखकर सोच में पड़ गयी।  ऐसे कितने ही दृश्य माॅल में आॅखो के सामने से गुजर जाते हैं, जहाँ बगल की टेबल से नये रिश्तों की शुरुआत होती नजर आती है तो कभी रिश्तों के टूटने की धीमी सी आहट सुनायी देती है । महानगरों के माॅल्स इन भावनात्मक कहानियों के मूक गवाह है ।
मॉल्स में आने वाले लोगों की शारीरिक भाषा भी उनके मन के भाव स्वतः ही व्यक्त कर देती है।
जींस के साथ चूड़ा पहने नववधू जब माॅल में प्रवेश करती हैं तो लगता है कि जैसे आधुनिकता कुछ- कुछ परम्पराओं का दामन पकड़े चली आ रही है। इसे फैशन की दुनिया में "फ्यूजन" कहते हैं। माॅल्स के बड़े- बड़े ब्रांडेड शोरूम मध्यम वर्ग को उनकी सीमित आय की याद दिलाते हैं, वहीं उच्च वर्ग के लिये वे स्टेटस सिम्बल हैं। उच्च वर्ग ब्रांडेड है तो अन्य वर्ग बाउन्डैड है अपनी आवश्यकताओं के साथ।
जीवन की सबसे बहुमूल्य चीजें तो हमें प्रकृति ने समान रूप से पहले ही निःशुल्क प्रदान कर दी हैं। जो ब्रांड के रुप में किसी भी वर्गीकरण से परे हैं। माॅल में सबसे ज्यादा प्रसन्न मध्यमवर्गीय परिवार ही नजर आता है। वह अपनी इस visit को एंन्जाय कर रहा होता है। बुजुर्ग  दंपति जब माॅल में अकेले घूमते नजर आते हैं तो लगता है कि जैसे बच्चे नौकरी पर बाहर चले गए और अब यह अकेले हैं। कहीं कहीं सपरिवार जब बुजुर्ग दिखते हैं तो हृदय को शांति सी मिलती है।
माॅल्स की शाॅपिग में आपको आॅफर बहुत मिलेंगे जैसे, "सुपर 99", "एक के साथ एक फ्री" आदि। ये सब ऐसे हैं जैसे मछली पकड़ने के लिए आटे की गोली। उपभोक्ता लाभ के लोभ में यह भूल जाता है कि कोई भी व्यापार घाटे के लिए नहीं किया जाता है। ऐसे सी एक शाॅप पर मैं पहुँची कुछ खरीदने की इच्छा से, जहाँ लिखा था "सुपर99"। दुकान में पहुँचकर  मूल्य देखा तो 499,399,299,199।   क्रोध तो बहुत आया मगर क्या कर सकते हैं । उनकी शर्तें इतने छोटे अक्षरों में होती हैं कि उन्हें सूक्ष्मदर्शी से ही पढ़ना संभव है ।
मॉल्स में काम करने वाले लोग बड़े  professional होते हैं। हमेशा आपको मुस्कराहट के साथ attend करेंगे।
मॉल्स में सबसे ज्यादा खुश नजर आते हैं बच्चे 'जो इधर उधर फुदकते हुए ,हर बार नयी जिद कर रहे होते हैं। कभी fun zone में झूलों की तो कभी food court में कुछ खाने की ।
मॉल्स ने हमारे जीवन में बहुत कुछ बदल दिया है। हमारी खरीददारी  की शैली और हमारा दृष्टिकोण भी।
मॉल्स 'भौतिकवादी जगत का भव्य दर्शन' हैं, जहाँ हम आवश्यकताओं से इतर बहुत सारी अनावश्यकताओं में घिर जाते हैं। जो बाजारीकरण की संस्कृति की सफलता है। मॉल्स में खुलकर खरीददारी कर सकें और ब्रान्डैड  रह सकें, इसी कारण कुछ दिग्भ्रमित युवाओं की वजह से महानगरों में अपराध भी बढ़ा है।
कोई भी चीज अच्छी या बुरी नहीं होती बल्कि हम उसे जिस रूप में अपनाते हैं वह वैसी ही हो जाती है।
आप भी माॅल जरूर जाइए, मगर अपने दृष्टिकोण और आवश्यकताओं के साथ ......

लेखिका
डॉ0 अनीता ललित मुदगल,
प्रधानाध्यापिका
श्री श्रद्धानंद प्राथमिक पाठशाला 
नगर क्षेत्र झींगुरपुरा मथुरा  (उ.प्र)

1 comment:

  1. विषय को हल्का फुलका रखते हुए लेखन को काफी गंभीरता दी है पैनी नज़र देख कर से उस दृश्य का एक चित्र अपनी कलम से उकेरा है जिसे देखकर लगता ही नही कि यहाँ इतना सब चल रहा है

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