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दृष्टिकोण

उन्हें सफलता की चमक लुभाती है।
हमें सार्थकता की महक सुहाती है।

उन्हें चौड़ाई में पसरने की दरकार है।
हमें गहराई में उतरने से प्यार है।

उन्हें अमीर बनने का जुनून है।
हमें ज़मीर बचने का सुकून है।

उन्हें बाहर पड़ा माल जुटाना है।
हमें भीतर सोया बीज उगाना है।

उन्हें अपनी तीव्र बुद्धि पर विश्वास है।
हमें अपनी चित्त-शुद्धि से आस है।

उन्हें कुछ बन के जहान को दिखाना है।
हमें कुछ कर के भगवान को रिझाना है।

रचनाकार
प्रशांत अग्रवाल
सहायक अध्यापक
प्राथमिक विद्यालय डहिया
विकास क्षेत्र फतेहगंज पश्चिमी
जिला बरेली (उ.प्र.)

3 comments:

  1. एक अच्छे प्रयास के लिए बधाई, विरोधाभाषी तुल्यता का अच्छा तालमेल प्रस्तुत किया गया है। तुलना के लिए दूसरा पक्ष स्पष्ट नहीं है...किससे तुलना की जा रही है एक पाठक के तौर पर समझ नहीं पा रहा हूँ... शेष शुभ शुभ... मेरी शुभकामनाएं।

    👏👏👏👏👌👌👍💐💐💐

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  2. महोदय,
    सादर नमस्कार,
    दूसरा पक्ष वह तथाकथित विकसित सोच है जो नैतिक मूल्यों की कीमत पर ऊंचे भवन खड़े करने को होशियारी और व्यवहारिकता मानती है।
    गौर फरमाने के लिये साधुवाद...

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  3. उन्हें कहकर संबोधित किया गया है, इसलिए अस्पष्टता दृष्टिगोचर हुई.... भाव पक्ष की सुस्पष्टता सामान्य पाठक के लिए कविता में आवश्यक है।

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