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किस राह पर चल रहा है देश

किस राह पर चल रहा है देश,
क्या खंजर की शक्ल में ढल रहा है देश.....
नजरों से चश्मा हटा के तो देखो,
क्या कब कर रहा है देश।
मन शांत करके तो देखो,
कैसे सो जग रहा है देश।
जाति के बंधन हटा के तो देखो,
किसको अंग लगा रहा है देश।
क्या दहक रहा है ,
किस आग में जल रहा है देश।
ऊचाइयां मंगल तक छू गयी,
या गौवंश वध में चल रहा है देश।
नफरत तब थी जब गोरे यहां थे,
या अब नफरतों में उबल रहा देश।
ये आज़ादी कैसी है 'प्रभात',
जब द्वेष पर चल रहा है देश।
केसरिया त्याग का संदेश देता था,
क्या लहू से ही धुल रहा है देश।
करोड़ों रुपयों के मस्तियों में झूमता,
या चंद सिक्कों की मुफलिसी में मर रहा है देश।
अब आज़ाद भगत बिस्मिल को याद करे,
या सत्ता की राह पे बस चल रहा है देश।
कौन है, क्या लक्ष्य है, फर्क क्या,
बस मेरे पते की बात पर छल रहा है देश।
तुमने आज़ादी क्यू दिया हमकों
माँगा था क्या हमने,
बस खुद अपनी अपनी बात में जल रहा है देश।
जख्म गहरी हो रही है हर रात 'प्रभात' की,
बस खंजरों की शक्ल में अब ढल रहा है देश।

रचयिता
प्रभात गोरखपुरी त्रिपाठी
(स0 अ0) पू मा विद्यालय लगुनही गगहा,
गोरखपुर
(9795524218)

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