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बंद कमरे

अंधेरे बंद कमरे
कोने में दुबके से
हैं दिन
जिन्हें नसीब नही
होता
मुँह देखना कभी
रोशनी का,
हर मकान की
खिड़कियां ,दरवाज़े
बंद हैं इस डर से
कि रास्ते का
सूरज
कहीं उनके अंधेरों का
राज़ न जान ले,
छुपाते हैं
एक -दूसरे से
ग़म और खुशी
डरती है आने से
होठों पर हँसी ,
रोशनदान तक में
स्वार्थ का पर्दा
पड़ा है,
अब तो जो
कभी-कभार आ जाया
करती थीं हवायें
आकर लौट जाती हैं,
पता नहीं
कैसे जी लेती हैं साँसें
घुटन भरे बंद कमरों में,
क्यों खो जाती वो
ताकत
जो सामना करती
एक -दूसरे का,
समेटकर बिखरती
रोशनी ,
अपने दिनों का
दामन भरकर
अब जी लेते हम
अपनी साँसें
खुली फिजाओं में
---- निरुपमा मिश्रा "नीरू "

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