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अंतर्दृष्टि

तुमने चाहा क़ि मैं गांधारी बन जाउँ
बाँध लूँ अपनी आँखों पर पट्टियां
मैंने बाँध भी ली
पर कानो से सुना आहटों से पहचाना
अपमान ,छल,घुटन
प्रताड़ना
रिश्तों के भयावह रूप
सभ्य चेहरों के पीछे छिपी असभ्यता
शुद्ध वस्त्रो के पीछे छिपे काले कारनामे
क्या यही सब छिपाने के लिए
तुमने मुझसे ये छल किया
काश मैं अवहेलना कर पाती तुम्हारी
न बांधती आँखों पर पट्टियां
तब ये अंतर्मन का महाभारत तो न होता
अपनी अस्मिता ,सम्मान को पहचान दे पाती
                                              तनु

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