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क्या रक्खा है होली में

अंतस में बेचैनी सी है,जहर घुला है बोली में
रंग सभी काले दिखते हैं,क्या रखा है होली में.....
मुस्कानें हैं ऊपर-ऊपर, अन्दर दावानल जलता है
सारे नाते सने स्वार्थ में, भाई को भाई खलता है
दो मीठी बातें करने को समय नही अब पास किसी के
दुराचरण विद्वेष घृणा अब, यहाँ घूमते टोली में...
क्या रखा है है होली में....
जहाँ नारियों की पूजा थी जहाँ देवता बसते थे
जहाँ कसौटी पर शिष्यों को स्वयं गुरूजी कसते थे
प्रज्ञा वहाँ भटकती है अब,शिक्षा खुद व्यापार हो गई
सहमा सा है रंग बसंती, लहू घुला है रोली में
क्या रखा है होली में....
किया अनुकरण पश्चिम का तो, सदगुण सारे दूर हो गये
त्याग तपस्या दया क्षमा सब, छिपने को मजबूर हो गये
केवल दूषित राजनीति ही, दिखती है हर ओर यहाँ पर
शासक भिखमंगे कहते हैं, वोट डाल दो झोली में
क्या रखा है होली में...
© पुष्पेन्द्र यादव

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