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हार क्या, क्या जीत है

आज लोगों के लबों पर बेरुख़ी का गीत है।
इश्क़ में दिल टूटते फ़िर हार क्या, क्या जीत है।
इस ज़माने में कहाँ बाक़ी मुहब्बत है बची,
हैं दिलों में रंजिशें अब कौन किसका मीत है।
ज़ात भाषा धर्म की तो हर  गली हैं सरहदें,
ये सियासत है अनोखी या चली नव रीत है।
जम चुके हैं बर्फ़ जैसे ख़ून के रिश्ते यहाँ,
सो गई अब प्रीत जैसे साल भर की शीत  है।
साज सब निर्दोष तू रखना सजा करके अभी,
ग़र नहीं है आज तो कल को मधुर संगीत है।
रचना- निर्दोष कान्तेय
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काव्य विधा- ग़ज़ल
अरक़ान=  फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन       फ़ाइलुन
वज़्न=      2122 2122 2122 212

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