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हसीं ख़ाब


कभी पूजा हमें तुमने कभी दिल से निकाला है।
तुम्हारी इन अदाओं ने क़सम से मार डाला है।
ज़बां मीठी हसीं रुख़सार करते क़त्ल कितनों का,
नहीं ये जान पाये दिल तुम्हारे पास काला है।
हँसी तेरी ख़ुशी तेरी जलाती दिल ग़रीबों का,
तुम्हारे घर दिवाली है दिवानों का दिवाला है।
मुहब्बत जानलेवा है लगाकर दिल कभी देखो,
समझ लो ख़ुदकुशी का फ़िर सबब  ये लामुहाला है।
न लत ये प्यार की निर्दोष अब है छूटने वाली,
तभी फ़िर से अरे तुमने हसीं ये ख़ाब पाला है।
- निर्दोष कान्तेय
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शिल्प-
बह्र- बहरे हज़ज मुसम्मन सालिम
अरक़ान- मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन
वज़्न- 1222 1222 1222 1222

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