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छोटी सी ये प्रेम कहानी

छोटी सी ये प्रेम कहानी, लेकिन सुनो इसे विस्तार।
प्रेमांकुर प्रस्फुटित हुआ कब, चढ़ा मुझे कब प्रेम बुखार।
जैसे ही शिक्षा से फारिग , रोजगार से हम थे दूर।
ख्वाब सजावें ऊँचे ऊँचे, काम न कुछ मौजें भरपूर।

उन्हीं दिनों मामा के घर पर, आये नए किरायेदार।
सभ्य सदाचारी थे लगते, उनकी थीं कन्यायें चार।
पहली कन्या गौरवर्ण की, सुन्दर मुख सुन्दर संस्कार।
देखा उसको एक बार तो, मामा जी से बढ़ि गा प्यार।

एक रोज की बात कहें हम, उसने दी हमको मुस्कान।
ब्याज सहित लौटारेन मुस्की, शुरू हुआ फिर प्रेम पुरान।
सोच लिया था मैं थामूंगा, उसके जीवन की पतवार।
लेकिन बात बनेगी कैसे, बाबू जी मेरे खूंखार।

कन्या सुन्दर और उमर थी, दशक तीसरे की शुरुआत।
एक नजर में दिल दे बैठे, हमने सोची जात न पात।
इक दिन अम्मा से बोले हम, उसके घर चलवाओ बात।
बाबू जी जब घर को आये, अम्मा कथा सुनाइन रात।

तुरत बुलौवा आया हमरा, और दनादन जूता लात।
जइसे तइसे बात बनी तब, बाबू जी समझे जज्बात।
इधर कुण्डली मिली उधर हम, दौड़ पड़े लेकर बारात।
लेन देन बिन ब्याह रचाया, फेरे घूमे पूरे सात।

चट्ट पट्ट दुई लरिका होइ गे, यहै मिली उनसे सौगात।
बाद ब्याह के कथा हुई यूँ, अक्सर पाये कच्चा भात।
उबर न पाये आज तलक हम, ऐसा था तगड़ा आघात।
लेकिन अब पछताए क्या हो, घटना घटने के पश्चात।

मिले न गुण छत्तिस मा याकौ, मुला आँकड़ा यहै हमार।
सिंह समान रहन हम लेकिन, सिंह वाहिनी हुई सवार।
दोष किसे दें समझ न आवे, ऐसी पड़ी वक्त की मार।
प्रथम हुआ संहार हमारा, बाद कथा का उपसंहार।

रचनाकार- निर्दोष कान्तेय

काव्य विधा- आल्हा छंद

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