फूल्स डे (Fool's Day’) : असल मायने में पूरे देश का सामाजिक पर्व
हर साल 1 अप्रैल को मनाया जाने वाला ‘Fool's Day’ (अप्रैल फूल) भले ही एक हल्के-फुल्के मजाक का दिन माना जाता हो, लेकिन अगर गौर करें, तो यह किसी भी अन्य सामाजिक पर्व से कम नहीं! इस दिन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें न कोई जाति है, न धर्म, न ऊँच-नीच, न अमीरी-गरीबी। ‘फूलनेस’ का यह जश्न सही मायनों में समानता और स्वतंत्रता का प्रतीक है। तो फिर इसे पूरे देश के सामाजिक पर्व का दर्जा क्यों नहीं मिलना चाहिए? इसी दिलचस्प तर्क को हास्य और व्यंग्य के तड़के के साथ प्रस्तुत कर रहा है यह लेख!
फूल्स डे (Fool's Day’) : असल मायने में पूरे देश का सामाजिक पर्व
देखिए, बात बिल्कुल सीधी और सटीक है—अगर किसी पर्व को राष्ट्रीय त्योहार का दर्जा मिलना चाहिए, तो वह सिर्फ़ और सिर्फ़ ‘फूल्स डे’ है। और अगर अब तक ऐसा नहीं हुआ, तो मान लीजिए कि हमने अपने सामाजिक विकास की ट्रेन किसी और ही दिशा में मोड़ दी है। अब ज़रा सोचिए—हमारे पास है कोई पर्व जिससे हमारा सामाजिक ढांचा संपूर्ण हो जाता है? क्या ‘फूल्स डे’ जैसी एकता, समरसता और समभावना लाने वाली कड़ी की जरूरत नहीं?
फूल्स डे की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह सर्वसमावेशी पर्व है। इसमें न कोई जाति है, न धर्म, न रंगभेद, न वर्गभेद, न ऊँच-नीच। जो भी इस दिन आ जाए, वह फूल बनने के लिए स्वतंत्र होता है। और जो दूसरों को फूल बना सके, वह इस पर्व का असली महात्मा बन जाता है।
अब आप ही सोचिए—कौन सा पर्व इतना बड़ा समदर्शी और समाजवादी हो सकता है? इस दिन न कोई छोटा होता है, न बड़ा। अफ़सर से लेकर बाबू तक, नेता से लेकर आम जनता तक, प्रोफेसर से लेकर विद्यार्थी तक—सब एक ही पंक्ति में खड़े हो जाते हैं। किसी की भी हालत इस दिन देखने लायक होती है।
वैसे तो साल के 365 दिन हम इस ‘फूलनेस’ का उपभोग करते हैं, लेकिन इसकी असली खुशी फूल्स डे के दिन ही देखने को मिलती है। यह वह दिन है, जब लोग पूरी ईमानदारी और निष्ठा से फूल बनते और बनाते हैं।
अब कोई कहे कि फूल बनने में क्या मज़ा है? तो भइया, उनसे विनम्रता से कहना चाहेंगे—फूल बनने में जितना मज़ा है, उतना बनने के बाद दूसरों के चेहरे के भाव देखने में आता है। यह एक ऐसी कला है, जिसमें हर साल लोग नए-नए प्रयोग करते हैं।
अब जरा गंभीर होकर विचार कीजिए—हमने कई पर्वों को सामाजिक मान्यता दी है, लेकिन फूल्स डे को अब तक नजरअंदाज कर रखा है। यह सामाजिक पर्व बनने की हर कसौटी पर खरा उतरता है: क्योंकि
इस दिन हर व्यक्ति को बिना भेदभाव के फूल बनने और बनाने का अवसर मिलता है। यह लोकतंत्र का सच्चा उदाहरण है।
इस दिन दुश्मन भी हंसकर एक-दूसरे को फूल बना सकते हैं। रिश्तों की मजबूती का ऐसा उदाहरण और कहां मिलेगा?
अगर लोग इतनी दिलचस्पी से कोई पर्व मनाते हैं, तो क्या उसे आधिकारिक मान्यता नहीं मिलनी चाहिए?
अब ज़रा सोचिए, अगर फूल्स डे को सामाजिक पर्व नहीं घोषित किया गया, तो यह इतिहास की सबसे बड़ी भूलों में शामिल होगा। हमारी आने वाली पीढ़ियाँ हम पर हंसेंगी और कहेंगी— "इन लोगों को एक ऐसा पर्व मिला था, जिसमें आनंद, स्वतंत्रता और समरसता थी, लेकिन इन्होंने उसे मान्यता ही नहीं दी!"
इसलिए, सरकार और समाज से हमारी विनम्र अपील है कि इसे तुरंत सामाजिक पर्व घोषित किया जाए। और अगर सरकार इसमें देर करती है, तो जनता को अपनी ‘फूलनेस की शक्ति’ दिखानी होगी। आखिर, फूल बनने और बनाने का अधिकार भी हमारा मौलिक अधिकार होना चाहिए!
✍️ व्यंग्यकार : प्रवीण त्रिवेदी "दुनाली फतेहपुरी"
शिक्षा, शिक्षण और शिक्षकों से जुड़े मुद्दों के लिए समर्पित
फतेहपुर, आजकल बात कहने के लिए साहित्य उनका नया हथियार बना हुआ है।
परिचय
बेसिक शिक्षक के रूप में कार्यरत आकांक्षी जनपद फ़तेहपुर से आने वाले "प्रवीण त्रिवेदी" शिक्षा से जुड़े लगभग हर मामलों पर और हर फोरम पर अपनी राय रखने के लिए जाने जाते हैं। शिक्षा के नीतिगत पहलू से लेकर विद्यालय के अंदर बच्चों के अधिकार व उनकी आवाजें और शिक्षकों की शिक्षण से लेकर उनकी सेवाओं की समस्याओं और समाधान पर वह लगातार सक्रिय रहते हैं।
शिक्षा विशेष रूप से "प्राथमिक शिक्षा" को लेकर उनके आलेख कई पत्र पत्रिकाओं , साइट्स और समाचार पत्रों में लगातार प्रकाशित होते रहते हैं। "प्राइमरी का मास्टर" ब्लॉग के जरिये भी शिक्षा से जुड़े मुद्दों और सामजिक सरोकारों पर बराबर सार्वजनिक चर्चा व उसके समाधान को लेकर लगातार सक्रियता से मुखर रहते है।
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