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ऐसे क्यों निहारते हो

ऐसे क्यों निहारते हो
तुम मुझे
कि जैसे
आसमान घिरा हो
बादलों से
और तुम उनमें
झिलमिलाते
चाँद जैसे ,
ये सुरमई धुंधलका
क्यों समेटता मुझे
तुम्हारे अंकपाश में,
छलकती सुधारस
प्रीति -गागर,
हृदय की अधीरता
अनायास
होती उजागर ,
दीपक की रोशनी
में नहाई
मोम -सी काया,
जलती हुई बाती-सा
प्रिय -उच्छवास
गहराया......
----- निरुपमा मिश्रा "नीरू"

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