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मानव का यह धर्म....


मानव का यह धर्म कदाचित प्रीति करो कुल रीति निबाहो।
दृष्टि रखो हित न्याय सदा मन में शुचि कोमल भाव सदा हो।
शूर बनो निज देश निमित्त न  किंचित भी अब कायरता हो।
लक्ष्य कभी मत तू डिगना पथ में यदि लाख भले विपदा हो।
रचनाकार- निर्दोष दीक्षित
काव्य विधा- मत्तगयन्द अथवा मालती सवैया छंद
शिल्प- 7 भगण+ गुरु गुरु..... 4 पद
           {(211)7+22}4
           प्रत्येक पंक्ति में कुल 23 वर्ण।

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