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जीवन का विश्वास

धरती ने नित परहित विकसित किये नवांकुर हैं
परहित जीवन जीयें सार्थक वरन क्षणभंगुर है
मलयज के संग- संग चले अगर
जीवन की श्वांस बने,
कलकल करती नदियों के संग
जीवन का विश्वास बने,
सृष्टि का कण -कण देखो परहित में खुद आतुर है
सर्वस्व दिया नदियों ने
फिर क्यों सागर खारा सदियों से,
परहित प्रेम धरोहर जीवन
चलता रहता नदियों से,
अम्बर छलकाये घन-गागर प्रमुदित अंकुर है
प्रमादित नयनों के सपन-तितिक्षा
जब सुख आधार बने,
हृदय विचलित होता जब
प्रीति भी जगत -व्यापार बने
जग-हित बरसे बादल जो अब धरती मधुर है
----- निरुपमा मिश्रा " नीरु "

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