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बेशर्मा, बेशर्मा ही रहेगा

बेशर्मा,  बेशर्मा ही रहेगा

कहते है, 
खरबूजा खरबूजे को देख कर रंग बदलता है 
बारिश हुई और सारी बगिया हुई हरी भरी 
पर 
बेशर्मा बेशर्मा ही रहा 
वो किसी की सुनता ही  कहाँ? 
वह नहीं सुनेगा वह नहीं समझेगा 

वह तो बस अपनी धुन मे मस्त है 
जिंदगी उसकी जाने कहाँ व्यस्त है 
पर 
बेशर्मा बेशर्मा ही रहा 
परवाह उसको किसीकी कहाँ? 
वह नहीं सुधरेगा वह नहीं संभलेगा 


चाहे धरती आकाश अपनी जगह बदल ले 
पूरब का पश्चिम या उत्तर का दक्षिण  हो 

पर 
बेशर्मा बेशर्मा ही रहा
जो अडिग है वो हिलेगा कहाँ? 
वह नहीं चलेगा वह नहीं बदलेगा 


अब तो सबने जाना और सब ने मना है 
समय के साथ बदल जाता जमाना है 

पर 
बेशर्मा बेशर्मा ही रहेगा 
देख कर भी सबकुछ मानता है कहाँ? 
वह नहीं जानेगा वह नहीं मानेगा 

✍️
गोपाल बाबू पाण्डेय
सहायक अध्यापक
प्राथमिक विद्यालय हिलौली
सरेनी रायबरेली

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