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आ अब लौट चलें...

आ अब लौट चलें...

जी हांँ,अब वक्त आ गया है...अब लौटने की बारी है। बहुत भाग लिया हमने... परम्पराओं को तोड़कर, वर्जनाओं को लाँघकर।
    अब देखिए न ... हमने आधुनिकता की होड़ में जिन-जिन चीजों की अवहेलना की,आज वही चीजें मल्टीप्लेक्स और मॉल में मुंँह चिढ़ा रहीं हैं ... और हम उन पैकेट्स के ऊपर छपी न्यूट्रीशनल इनफॉरमेशन्स का अवगाहन कर अपनी क्रय शक्ति की खुजली मिटा रहे हैं...देखते ही देखते हम बाजारू व्यवस्था के कठपुतली बन गए* ।
    हमारे यहांँ खेत -खलिहान में बैल-कोल्हू क्या खत्म हुए.. किसी ने इसे ब्रांड ही बना लिया।
     जौ,बाजरा,मक्का,चना जैसे मोटे अनाज कब मल्टीग्रेन में तब्दील हो गए, पता ही नहीं चला।यह देहाती माल अब मॉल का आकर्षण बना हुआ है। कभी इन मोटे अनाजों की रोटी तोड़ कर ही हमारे पूर्वज पहलवान हुआ करते थे।हमें तनिक सा आखरबोध क्या हो गया,हमने उनके अनुभवों को तरजीह ही नहीं दी।कहते हैं न.. *जो बड़े-बुजुर्ग के तजुर्बे से नहीं सीखता,उसे वक्त सिखा देता है* । जी हांँ,कुछ ऐसा ही वक्त चल पड़ा है जो हमारी अज्ञानता के घूँघट उठा रहा है।
      तिलहन और दलहन से भरपूर दालान को हमने सूना कर दिया.... और अब हम बखान करते हैं नेचुरल आयल की ... अनपालिश्ड दाल की।टीवी और अखबार में विज्ञापन देख व पढ़ कर हम सब ज्ञानी गुदरिया बन बैठे थे।
 यह तो शुक्र है वक्त का जो पर्दा उठा रहा है ..
याद करिए......गुड़ की भेलियाँ कभी घरों का श्रृंगार हुआ करती थीं।आतिथ्य-प्रेम से रससिक्त भेलियांँ ही सनातन संस्कृति का परिचय करा देती थीं। न जाने कब हौले से उन भेलियों का जगह मैदे के बिस्किट ने ले लिया...और जैसे ही मैदे से नुकसान की खबरें उड़ीं तो बाजार ने उसे भी भुना लिया...0% मैदा वाले बिस्किट उतार दिए। जब 100% आटे का बिस्किट ही खाना था तो उससे तो कहीं बेहतर हमारा आटे का ठेकुआ था जो कई दिनों तक बिना किसी प्रतिरक्षक के अपने वजूद पर टिका रहता था।
     तथाकथित प्रगति के पथिक होने के दंभ में हमने जिस मड़ुआ को उपेक्षित किया,आज वही मड़ुआ जब रागी (Ragi) के रूप में पैकेटबंद हुआ तो हम अपनी संकीर्णता को तुष्ट करते हुए उसके पौष्टिकता को पुष्ट करते नजर आ रहे हैं।
     शुक्र मनाइए कोरोना का....कि काढ़ा जिंदा हो गया!नहीं तो यह भी कोमा में था।हम तो अदरक, इलायची,लौंग...सब उस चायपत्ती के पैकेट में ही खोजने लगे थे।
   अभी भी देर नहीं.…. ‌तो आइए लौटें.... प्रकृति की ओर,परम्परा की ओर...।


✍️
 अलकेश मणि त्रिपाठी " अविरल "( स.अ.)
 पू.मा.वि.- दुबौली
 विकास क्षेत्र - सलेमपुर
 जनपद - देवरिया (उ.प्र.)

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