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दिये का रहस्य

दिये का रहस्य      

 ऐ दिए की लौ तू जो इस तरह जल रही है
अनायास ही मुझमें कुछ पूछने का हौसला भर रही है।
क्या तू किसी साधना में रत है
या किसी के प्रेम में विह्वल
क्योंकि तू कभी बेहद भावुक
तो कभी शांत चित्त सी लगती है।
तू हवा को साधती हुई
कभी स्थिर तो कभी चंचल सी हो रही है।
हिम्मत न हारने का संकल्प लेती हुई
असहज से सहज होती हुई
निर्बल से सबल होती हुई
एकनिष्ठ जलते रहने की तुझमें ये कैसी लगन।
ऐ दिए की उद्दीप्त लौ दिया ही तेरा आलंबन
दूर करे तू गहन तिमिर को रहे साधना में अविरत।
दिए संग ही जीना मरना कैसी प्रीत निभाई है
फिर दिए तले ही रहे अंधेरा राज समझ ना पाई मैं
तूने अपना सब कुछ तो इस दिए के संग दमकाया है
उस तक तू क्यूं पहुंच न पाई अंधकार गहराया है।
लौ ने अपनी चुप्पी तोडी सहज भाव से हंसकर बोली
अंधकार है नहीं वहां पर 
शीतल सुंदर छाया है
मेरे जलते रहने का 
रहस्य वहीं समाया है।    
      
✍️
संगीता श्रीवास्तव प्र.अ.     
इंग्लिश मीडियम प्रा.वि.झरवा
क्षेत्र खोराबार, गोरखपुर

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