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हंस हुए निष्कासित अब

उजले-उजले लोगों के मन कितने मैले-मैले।
रूप सभी का एक मगर अलग-अलग हैं थैले।।


स्वार्थ, वाद उर भीतर बैठा, मन में अब प्यार नहीं।
प्रीति-रस, गंध से रचा बसा क्या यह संसार नहीं।
रक्षक बन तक्षक हैं बैठे, चहुंओर भेड़िये फैले।।


है अपना, कौन पराया, सब रिश्ते-नाते झूठे।
अर्थ, पद के चहुंओर घूमते, रहते रूठे-रूठे।
बंधु, मित्र, पुत्र बन जाते, आस्तीन के सांप विषैले।।


काले-काले दिन देखे हैं, उजली-उजली रातें।
अपनों को भी करते देखा बदली-बदली बातें।
हंस हुए निष्कासित अब, सम्मानित काक वनैले।।


खूंटी पर टंगे हुए मानवीय आदर्श सुनहरे।
सच्चाई की जिह्वा पर दिवस-निशा रहते पहरे।
हत्यारे, चोर, डकैत घूमते, सजकर बन छैले।।



लेखक :
✍  प्रमोद दीक्षित 'मलय'

सम्प्रति:- ब्लाॅक संसाधन केन्द्र नरैनी, बांदा में सह-समन्वयक (हिन्दी) पद पर कार्यरत। प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में गुणात्मक बदलावों, आनन्ददायी शिक्षण एवं नवाचारी मुद्दों पर सतत लेखन एवं प्रयोग।

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