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नारी

अाँखों के खालीपन को,
काजल से भरने की कोशिश करती है।
इस तरह जिंदगी को भी ,
सजाने की कोशिश करती है।
अनकही अधूरी बातों को,
समझाने की कोशिश करती है,
सूनापन जो छाया है,
उससे लड़ने की कोशिश करती है।
एक बेटी है जो जीवन भर,
बस त्याग की कोशिश करती है,
एक नारी है जो सपने त्याग - त्याग,
तिल-तिल कर यूं ही मरती है।
जंजीरों से जकड़ी रहती है,
मर्यादाअों की,अाडम्बर की,
निज इच्छाओं की कोर्इ बात नही,
कर्इ बार हार जी उठती है,
कुति्सत ही है वो सोच जो,
अरमान जलाया करती है,
कलियों को वेदी पर बैठाकर ,
जो फूल बनाया करती है।
तुम चुप,मैं चुप,सब चुप,
वेदना जब बताने की कोशिश करती है।
माँ-बाप कहीं न लजि्जत हों,
जीवन भर कोशिश करती है।
कुछ उम्मीदों,कुछ अाशाओं से,
अपने मन को भरती है।
पथ के काँटों से घा़यल पर,
बढ़ने की कोशिश करती है।

लेखिका :
✍  अलका खरे
प्र0अ0
कन्या प्राथमिक विद्यालय रेव,
ब्लॉक मोठ
जनपद झांसी

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