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पर्यावरण और हम

पर्यावरण और हम

विकास की दौड़ में हमने, 
पर्यावरण और पारिस्थिति की 
कभी ना की परवाह,
परिणाम, जलवायु परिवर्तन का, रौद्र रूप का दिखता प्रवाह ।

मौसम का चक्र अनियमित,
 तो कहीं बेमौसम बरसात।
 नदियों का अतिक्रमण कर, बनाए हमने होटल और आवास।

 आमंत्रित हुआ विनाश तब विकास हुआ विफल।
पहाड़ों का टूटना,नदियों का  अनियंत्रित मिलता नहीं इसका हल।
धराली जैसी आपदा है इसका फल।

विकास के साथ-साथ हमें रखना होगा,प्रकृति से मित्रता का भाव।
अपनाना होगा वैज्ञानिक दृष्टिकोण जिसका है अभाव।
लगाए हम"एक पेड़ माँ के नाम" मिले प्रेम की छाँव।

प्रकृति से माँ जैसी रखें ममता होगा मानवता का कल्याण।संरक्षण करें प्रतिदिन हम मिलकर बचाये हम वृक्षों के प्राण।

✍️
डॉ. गीता पांडेय,(स.अ.)
प्रा. वि. पथरा, नगर क्षेत्र, गोरखपुर।

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