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वो बेटा हैं ! मैं बेटी हूँ !


"" वो बेटा हैं ! मैं बेटी हूँ ! ""
लो सांझ हुई फिर से 
और उमड़ पड़ी
वेदना भरी करुण.....
बेटी की पुकार ! फिर से
फिर आज उसे , डाटा पापा ने
भाई से लड़ जाने पे
बूढी दादी ने फटकार लगाई
चूल्हा न जलाने पे
बैठी कोने में आँगन के
सिसकिया लेती रहती वो
   क्यों .......
माँ भी कुछ न बोल सकी
उसके छुपकर रोने पे ।
        इतना अन्तर क्यों होता है
        वो बेटा है ! मैं बेटी हूँ !
बेटे को तेरे चोट लगी
तो आह!! तेरे दिल से निकली
मुझको भी तो देख ले माँ.....
      क्या.......
मेरे चोटो का मोल नही !!
मैं उजियारा ले आऊँगी
तू ज्ञान का दीप जलाने तो दे
मैं पढ़ कर तुझको दिखलाऊँ
पहले स्कूल जाने तो दे ।
मैं सिमट गई हूँ , घर आँगन में
कुछ बन कर मुझे दिखलाने तो दे।
स्वछन्द रूप से उड़ पाऊ
पंख ऐसे फैलाने तो दे ।
          इतना अन्तर क्यों होता हैं
          वो बेटा है! मैं बेटी हूँ !
माना बेड़िया हैं ऐसी
समाज के रूढ़ि विचारो की
उनको तोड़ के हे !जननी
अब तो मुझको परिवर्तन दे ...
आलिगंन करु ऐसी शिक्षा
जो सार्थक कर दे जीवन ।
पर्वत जैसी मैं बन सकती
नदियो सी अविरल चल सकती
है वायु से भी गति तेज़ मेरी
गगन से विस्तृत फैल सकती
     पर .....
मुझको जीने का आधार तो दे
मिटा के हर भेद अब
शिक्षित मुझको बनने तो दे ।
अब उस पल को छोड़ दे माँ
जब तू न पढ़ पाई थी
अपने माँ - बाबा की आँखो में
तू तो सदा पराई थी !
मुझको तू अपना ले
बेटे का फर्ज निभाउंगी
सच कहती हूँ माँ ! तुझसे
तेरे बुढ़ापे की, मैं लाठी बन जाऊँगी ।
बेटी हूँ फिर भी, मैं पढ़क़र
आगे बढ़क़र दिखलाऊँगी ।
          इतना अन्तर क्यों होता हैं
          वो बेटा है ! मैं बेटी हूँ !
कितने भी जुल्म करले मुझपे
          पर .......
मुझको तू अपना तो ले
एक बार अंधेरे इस मन में
तू ज्ञान का दीप जला तो दे
          फिर! ........
तेरा जीवन मेरा जीवन
मधुबन जैसा बन जायेगा
          फिर! .........
शिक्षित होकर बेटे - बेटी में
फर्क कहाँ रह जायेगा ।
ये सत्यसार हैं जीवन का
माँ तू तो समझ गई
          फिर! ......
पापा क्यों न समझ पाये
मैं आँखो के उनकी ज्योति हूँ ।
कहते रहते है , अब भी क्यों!!!!
      "वो बेटा है ! तू बेटी हैं !

रचयिता
दीप्ति राय, स0 अ0
प्राथमिक विद्यालय रायगंज
खोराबार, गोरखपुर
                  

                                            

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