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बसन्त का स्वागत गान

ऋतुराज ने सम्पू्र्ण वातावरण में अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कर दी है.न केवल भौतिक वातावरण वल्कि मानवीय पहलू भी इससे अछूते नही हैं.इनकी अल्हड़ता एवं मादकता प्रकृति के रोम-रोम में झलक रही है.मधुमास के स्वागत में प्रस्तुत है एक गान.......

पीली सरसों का देख रंग
तन-मन में, उठ रही उमंग
मधुदिन की खुशियां हैं अनंत
आ पहुंचा कैसे ?देखो वसंत.
            'भू' का, हरियाली बना वसन
             अपनी डाली पर लद गये सुमन
            मद-भर से युक्त बह रही पवन
            स्वागत है ! हम करते नमन्.
रति- संग पाने को आतुर अनंग
पर भय है, हो, ना शील भंग
उर में छिड़ी है मौन जंग
है अनपेक्षित, प्रज्वलित द्वन्द्व.

डॉ0 अनिल कुमार गुप्त,
प्र०अ०, प्रा ०वि० लमती,
बांसगांव, गोरखपुर

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