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भीख

‼ भीख ‼                     

मजदूर मंडी के नियम-कानूनों से अनजान था वह। मदन नाम था। मंडी में सबसे अपरिचित, बिल्कुल अलग-थलग। उसका वहाँ कोई अपना था भी नहीं लेकिन उसकी निगाहें कुछ ढूँढतीं फिर रही थी।
मंडी में अचानक कोई भी गाड़ी ठहरती तो सारे मजदूर गाड़ी घेर कर खड़े हो जाते और फिर शुरू होती मजूरी की योग्यता, कद-काठी, काम में तेजी और अंत में मजदूरी या पारिश्रामिक घटाने की जोड़-तोड़!...मदन नाम का वह शख्स जब तक कि कुछ समझ पाता तब तक सौदा तय हो जाता और मजदूर अपने आज के मालिक के साथ चल देते पीछे-पीछे, कंधे पर कुदाल और हथेली पर सुर्ती मलते-ठोंकते और मदन सिर्फ देखता ही रह जाता। लगभग एक घंटे गुजर जाने के बाद भी वह किसी एक व्यक्ति तक भी अपनी बात न रख सका और न ही किसी के नजर में आ सका। अचानक एक मोटरसाइकिल रूकी ही थी कि वह अविलम्ब दौड़कर मोटरसाइकिल के पास पहुंच कर  बोला- "मालिक हम चलेंगे आपके साथ।"
मोटरसाइकिल वाले ने पहले उसको ऊपर से नीचे तक निहारा और पूछा-
"कितने पैसे लोगे ?"
"जो भी आपकी मर्ज़ी होगी दे दीजियेगा साहब, मजूरी क्या बताना"-हड़बड़ाहट में बोल गया था मदन।
"फिर भी बताओ तो सही?"
"मालिक जो रेट चल रहा हो उससे दस-बीस कम भी दे देगें तब भी चलेगा.."- मदन के स्वर की लाचारी शायद उससे एक कदम आगे खड़ी थी।
"लग रहा है मंडी में तुम नये हो?
काम तो कर लोगे ना ?"- मोटरसाइकिल वाले ने व्यंग्यात्मक लहजे में पूछा।
"मालिक गरीब आदमी हूँ बिना मेहनत-मजूरी के कहां गुजारा! मजूरी तो जनम के साथ लिखकर आई है।
हाँ यह सही है कि मंडी में मेरा पहला दिन है"- मदन ने बड़ी मासूमियत से यह बात रख दी।
अच्छा चलो दो सौ रूपये दूंगा "बैठ जाओ गाड़ी पर।"

मजदूरी के राशि पर बिना किसी असहमति के मदन उनकी गाड़ी पर बैठ गया। मोटरसाइकिल अन्जान रास्ते और गलियों में रफ्तार बनाती एक भव्य मकान के सामने रुकी। मकान नि:संदेह किसी बड़े आदमी का था;मुख्य द्वार पर लिखा था ओ० पी० राय (अभियंता) ......मदन गाड़ी से उतर कर गेट पर खड़ा हो गया और मालिक के आदेश की प्रतीक्षा करने लगा।
अन्दर चले आओ! बाहर से सीढ़ी है ,ऊपर काम चल रहा है। राय साहब इशारा करके अपने ड्रांइगरूम में चले गये।
मदन सीढ़ी का किनारा पकड़े छत पर पहुंच गया। छत पर दो राजगीर और चार मजदूर पहले से ही दीवार की चिनाई कर रहे थे। मिस्त्री ने मदन को देखते ही ईंटों के लगे चट्टे को छत पर पहुंचाने का काम आवंटित कर दिया..... बिना किसी परिचय और औपचारिकता के।
मदन ने सीमेंट के बोरे से पीठिका बनायी और लग गया ईंट ढोने के आदेश में। मदन, एकदम शान्त-गंभीर मुद्रा में व्यस्त । न किसी से कोई बात न कदमों में कोई आलस......सुबह से दोपहर तक लगातार ईंटों को छत तक पहुंचाता रहा मदन कि तभी ओह! उसका पैर फर्श पर फिसल गया। कुल बारह ईंटों सहित फर्श पर धड़ाम से गिरा मदन। शरीर कई जगह छिल गया ,अन्दरूनी चोंटे भी आईं..... लेकिन दुर्भाग्य एक ईंट छिटक कर पानी वाली टोटी पर जा गिरी। टोंटी पाइप से टूटकर निकल गया.... पाइप से पानी की धार निकलने लगी। मदन यह देखकर सहम गया । उसकी चोटों पर उस नुकसान ने मरहम लगा दिया और वह दर्द को भुलाकर पानी को हाथ से रोकने की असफल कोशिश करने लगा। वहाँ काम कर रहे सारे मजदूर काम रोककर उसकी गलती की तरफ देखने लगे। किसी का भी ध्यान इस बात पर गया ही नहीं, कि वह भी चोटिल हुआ होगा।
ईंटों की आवाज़ तब तक राय साहब के कानों में चुगली कर चुकी थी। रायसाहब दौड़कर छत पर आये और एक सेंकेंड में सारा माजरा समझ कर झल्ला उठे।

यह क्या कर दिया तूने हरामखोर!! राय साहब ने क्रोध में गरियाते हुए दहाड़ा "कर दिया न नुकसान, मुझे अंदेशा था कि तुम अनाड़ी हो,काम करने का ढंग नहीं है तुमको।"
पैर अचानक फिसल गया था मालिक, मदन ने अपने दोनों हाथ जोड़ लिये।
राय साहब ने मदन की बात को अनसुना कर दिया और निष्ठुर स्वर बोले- "तेरी आज की मजदूरी टोटी नुकसान के भरपाई में कटेगी। समझे!" मदन पर मानो वज्रपात हो गया!
"साहब गलती हो गई हम गरीब आदमी हैं,हाथ जोड़ कर माफी मांगते हैं, पैर फिसल गया था मालिक!"
"यहाँ दानखाता नहीं खुला है समझे ,कि जो चाहे नुकसान कर दे और हम छोड़ते जायें।" यह कहकर रायसाहब गुस्से में गरियाते हुए नीचे उतर गये।
मदन, दर्द-गाली और अपने निर्दोष गलती से निराश हो गया । लेकिन मन में यह बात जरूर थी कि इतने बड़े आदमी हैं दो- तीन सौ की चीज भूलकर हमको माफ कर देंगे।

शाम को जब मजदूरों का हिसाब करने का समय हुआ, सभी मजदूर नीचे बरामदे में खड़े हो गये। मदन बिल्कुल गुमसुम और चुपचाप किनारे खड़ा हो गया। रायसाहब सबका भुगतान करके मदन की तरफ पलटे..... और बोले
"अब तुम काहें खड़े हो वहां ? कहा न! कि तुम्हारी मजदूरी टोटी बनवाने में कट जायेगी...."
"मालिक माफ कर दीजिये गरीब आदमी हैं। गलती से पैर फिसल गया था। मालिक पैसे की बहुत जरूरत है आज। आज मजूरी दे दीजीए कल आपके वहाँ बिना मजदूरी के काम कर दूंगा..."मदन ने हाथ जोड़कर विनती की।
"बहुत होशियार बन रहे हो! चुपचाप चले जाओ और कल आना भी मत।" इतना कहकर कमरे के भीतर जाकर दरवाज़ा बंद कर लिया इंजीनियर साहब ने। मदन चुपचाप संज्ञाशून्य सा खड़ा रहा लेकिन मन में कहीं न कहीं यह आशा जरूर थी कि शायद दरवाज़ा फिर खुल जाये। लगभग पन्द्रह मिनट तक अन्दर से  कोई प्रतिक्रिया न होने पर मदन निराशा और भारी कदमों से बाहर निकल आया। लेकिन लगभग पचास मीटर जाने के बाद अपने आप, 'ठहर गये मदन के कदम'।
और घूम कर फिर वापस कदम बढ़ा दिये रायसाहब के घर की तरफ.....धड़कनें तेज हो गयीं, विचलित कदम,वापस अपमान की तरफ ही बढ़ने लगे।
दरवाजे पर दो मिनट ठहर कर  बहुत धीरे से दरवाजे को खटखटाया मदन ने। दरवाज़ा खुला और राय साहेब ज्यों ही दरवाजे से बाहर निकले........मदन उनके पैरों पर गिर पड़ा और गिड़गिड़ाने लगा।
"मालिक मेरा बेटा पिछले एक हफ्ते से मेहता अस्पताल में भर्ती है। हम गांव से चार हजार रूपये कर्जा लेकर आये थे। मालिक सब पैसा, सुई,दवाई और अस्पताल में खर्च हो गया। आज सुबह अस्पताल से छुट्टी होनी थी लेकिन हमरे पास डेढ़ सौ रूपये कम पड़ रहे थे। बस डेढ़ सौ रूपये कम होने के नाते डॉ साहब हमरे बच्चे को छोड़ नहीं रहे। मालिक अगर आज अपने बाबू को अस्पताल से नहीं छुड़ा पाये तो कल अस्पताल वाले साढ़े तीन सौ रूपया बेड का जोड़ कर मागेंगे..... बताइये हम कहां से पांच सौ रूपया लेकर आयेगें। मालिक हमारी मदद करिये हम बहुत परेशानी में हैं।अगर आपको विश्वास न हो साहेब तो आप हमारे साथ चलिये ऊ बच्चों के डा., मेहता जी के अस्पताल।
हम इस पर भी राजी हैं कि आप आज रात हमरे परिवार को एहीं बरामदे में रोक लिजिये । हम कल आपके यहाँ काम करके और कर्जा चुकाकर शाम को अपने गांव लौट जायेंगें...."मदन एक ही साँस में सब कुछ कह गया।
तब तक कालोनी में तमाशबीनों की भीड़ जमा हो चुकी थी। अठारह बीस आदमी-औरतें जुट गये, कानाफूसी बढ़ने लगी। राय साहब निशब्द हो चुके थे। उनकी श्रीमती जी जो रायसाहब के पीछे ही खड़ी थी और अचानक से राय साहब को झकझोरा, "अरे ! जल्दी पैसे दिजिये बेचारे को... गरीब की आह लग जायेगी तो ...."

मुहल्ले वाले भी मदद के लिये आगे बढ़े लेकिन मदन को केवल अपनी मजदूरी से मतलब था...केवल दो सौ रूपये के लिये वह अपमान के सागर में घंटों से गोते लगा रहा था।
रायसाहब ने अपराधबोध भरी आवाज़ में मदन से पूछा-- "यह तुमने दोपहर में क्यों नहीं बताया?"
"मालिक,सोचा था कि किसी के सामने भीख न मांगना पड़े इसीलिए मजदूर मंडी में चला आया। आपका काम भी मन लगाकर किया लेकिन ईश्वर तो जैसे परीक्षा ले रहा था। उसने मुझे यहाँ भी कैद करा दिया। मैने कल आने का वादा भी किया लेकिन मेरी खुद्दारी, मेहनत और वचन तीनों ठुकरा दिये गये। केवल जब भीख मांगा तब आपलोगों को विश्वास हुआ। शायद प्रभु भी मुझे भीख मंगवाने पर तुला था..."

पूरी कालोनी चुप थी.... बोल रहे थे तो सिर्फ, मदन के आंसू और अटकती आवाज.....
उसके आंसू,अपमान और वेदना,इन तीनों को जोड़ने पर शायद मुट्ठी में दो सौ रूपये के रूप में आ चुके थे।
मदन अपने हाथों में दो सौ पाकर तेज कदमों से अस्पताल की तरफ बढ़ा कई बार अंगोछे से मुंह पोछते हुए...
पराजय और मुक्ति का भाव लिये तेज कदमों से.... बहुत से प्रश्नों को रायसाहब के बारामदे में छोड़कर....बहुत कुछ हारकर....कुछ जीतकर भी..
अपने बेटे की आजादी के लिये अपनी आत्मा को बेचकर....

लेखक
रिवेश प्रताप सिंह
गोरखपुर

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