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अदृश्य दुश्मन

अदृश्य दुश्मन

खुशनुमा फिज़ा थी, समय था शानदार,
किया वक्त पर आखिर किस दुश्मन ने वार।
अदृश्य था वो दुश्मन, सब मान रहे थे उससे हार।
कैद हो गये घरो में लोग, बन्द हो गए हाट बाज़ार।
ज़िन्दगी थम सी गई, ठप्प हो गये कारोबार।
हम अगर अब भी न सम्भले,
तो बढ़ जायेगी इस दुश्मन की रफ्तार।
2020 गया, 2021 में भी,
कर रहा ये हम पर प्रहार।
दो गज की दूरी, मास्क है जरूरी,
 है इसको भगाने का हथियार।
अगर हम नहीं आगे बढ़े, तो
बचा न पायेगी हमको सरकार।
आओ शपथ ले मिलकर हम,
बनेंगे हम नागरिक समझदार।
बनेंगे हम नागरिक समझदार।

✍️
प्रेमलता विश्वकर्मा(स0अ0)
पूर्व माध्यमिक विद्यालय हुलासखेड़ा
मोहनलालगंज, लखनऊ

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