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पीड़ित बेटी का दर्द

पीड़ित बेटी का दर्द

इक गुजारिश

बताओं जरा क्या कसूर था मेरा,
बताओं जरा क्या कसूर था मेरा।
ना बहन समझा,ना समझा बेटी,
लूटी इज्जत,जलके मैं रोती।

फूटी किस्मत,रूठा जमाना,
किसको सुनाऊँ,मैं ये अफसाना।
किसी ने ना चाहा मुझे अपनाना,
लूटी इज्जत,मैं धन थी बेगाना।


जलाके मेरे अंग-अंग को मारा,
कोई ना हुआ इस देश में हमारा।
यही अब मैं कहती सजा दो उन्हें भी,
ज़िंदा ही जिंदा जला दो उन्हें भी।

जलता हुआ जिस्म जब तड़फड़ायें,
तो उनकी मेरी पीड़ा समझ आयें।
हे ईश्वर क्यों तू बेटी बनायें,
लूट जायें इज्जत,उन्हें क्यों रुलाये।

बुरा से बुरा हश्र हो उनका,
उड़ जाये ऐसे जैसे उड़े तिनका।
सुना है पुलिस ने है उनको मारा,
मेरा उन्होंने एक कर्ज उतारा।

उनके मरने से ना बदलेगी दुनिया,
फिर से वही कर्म करेगी दुनिया।
विनती है मेरी बदल दो कानून,
इज्जत लूटें तो सजा दो फौरन।

यूँ ही सिलसिला को बदल डालों,
लुटती बेटी की इज्जत बचा लों।

लुटती बेटी की इज्जत बचा लों।

✍️ दीपक कुमार यादव (स•अ•)
प्रा.वि.मासाडीह 
महसी बहराइच (उ•प्र•)
☎️9956521700

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