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निर्माण

शिक्षक समाज का पथ प्रदर्शक होता है, वह अपने ज्ञान की ज्योति से समाज को सन्मार्ग दिखाता है.अत: जब तक हममें शिक्षक कहलाने से ज्यादा शिक्षक होने का बोध नही होगा तब तक हम अपने दायित्व का निर्वहन ईमानदारी से नही कर पायेंगे. शिक्षक के द्वारा ही एक जिम्मेदार नागरिक एवं एक जिम्मेदार समाज का निर्माण होता है.इसी 'निर्माण' को ध्यान में रखते हुए कुछ पंक्तियां प्रस्तुत है......

निर्माण करना है ऐसे 'नीड़' का
नौनिहाल जिसमें पल-बढ़ सकें,
संस्कार पुष्पित पल्लवित हों
आचारवान सब बन सकें।

निर्माण करना है ऐसे नीड़ का
सुशिक्षित सब बन सकें,
तम दूर हो अज्ञान का
ज्योति ज्ञान का जल सके।

निर्माण करना है ऐसे नीड़ का
जिसमें, सम्मान सबका हो सके,
अपराजेय, अतुलनीय सब बने
कर्म, सब ऐसे कर सकें।

निर्माण करना है ऐसे नीड़ का
धर्मान्ध कोई न बन सके,
सत्य पथगामी बने सब
अजातशत्रु बन सके।

निर्माण करना है ऐसे नीड़ का
जिज्ञासु सब बन सकें,
दुर्बोध सब सुबोध हों
सन्मार्ग सबको मिल सके।

निर्माण करना है ऐसे नीड़ का
एकजुट होकर सब रह सकें,
मुक्त हों सब बन्धनों से
एक हैं 'एक' सब रह सकें।

निर्माण करना है ऐसे नीड़ का
'वसुधैवकुटुम्बकम्' जिसका हो अभीष्ट,
उस परम् सत्ता का सभी पर
हर काल में बनी रहे दृष्टि।


रचनाकार
डॉ0 अनिल कुमार गुप्त,
प्र०अ०, प्रा ०वि० लमती,
बांसगांव, गोरखपुर

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