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घुटन

खान साहब की खुदरा भूसे की दुकान तीन -चार किलोमीटर तक की परिधि के पशुपालकों; खासकर बकरी पालने वालों के लिये बहुत मशहूर हुआ करती थी। मुख्य सड़क से हटकर तकरीबन सौ मीटर अन्दर एक बीघे मैदान के किनारे में पड़ी हुई टीनशेड। शेड भी दो भागों में- सत्तर प्रतिशत में भूसे का स्टोरेज और तीस प्रतिशत में खान साहब की गृहस्थी।
खान साहब का गेहूँआ रंग, पचास-पचपन की उमर में भी कसी हुईं मजबूत शरीर......न दाढ़ी न टोपी..... दर्जी से सिलाई हुई सूती, गहरी जेब वाली बनियान। बड़ी सी रंगीन जंघिया,उनकी की वर्दी की तरह थी। शेड के बाहर,सुन्दर सी कबरी गाय और शेड के अन्दर बधीं हुई बछिया। बाहर से ऐसा कोई चिन्ह ही नहीं था कि कोई अनजान व्यक्ति यह जान पाये कि यह किसी मुसलमान की दुकान है । लेकिन इलाके में खान साहब के भूसे की दुकान इतनी मशहूर थी कि इस सवाल का तो मतलब ही नहीं था। शेड के अन्दर से निकलते धुएँ और बर्तन धुलने की खनक से ही  कोई अनजान ग्राहक जान पाता कि भीतर इनका परिवार भी रहता है। पुराने ग्राहक पारिवारिक हो चुके थे ,उन्हें खान साहब के छोटे से परिवार के सदस्यों का परिचय कराने की जरूरत नहीं थी। साड़ी और कमीज पहने हुए खान साहब की पत्नी.....मोटी तो नहीं थीं लेकिन तगड़ी जरूर थीं। रूखा सा चेहरा शायद ही किसी ने कभी उन्हें हंसते हुए देखा हो। घर से बाहर वह दो ही वजहों से निकलतीं थी -एक तो गाय को खरी-दाना खिलाने और दूसरा, खान साहब को चाय देने। बड़ी सी स्टील की गिलास में एक चौथाई चाय..चाय की मात्रा का अंदाजा पहले ही घूंट में खान साहब के मुंह के साथ  गिलास के साथ बन रहे कोण और झुकाव से लग जाता था। परिवार में तीन सदस्य थे, खान साहब और उनकी बेगम और उनका इकलौता लड़का रफीक़!....जो शहर से बाहर डाक्टरी की पढ़ाई कर रहा था।
खान साहब शान्त स्वभाव के व्यक्ति थे। कम बोलते थे। शायद वर्षों से अकेले भूसा भरते रहने  के कारण कम बोलना उनकी आदत में आ चुका था। बताने  के लिये उनके पास दो विषय ही उपलब्ध रहते है-पहला भूसे के दामों में उतार चढ़ाव और दूसरा अपने बेटे रफीक की काबिलियत और डाक्टरी तक के सफर की कहानी...हमेशा बताते थे कि रफीक शुरू से ज़हीन थे। पढ़ाई-लिखाई के सिवा कहीं मन न लगाते थे रफीक। खान साहब यह भी बताने से नहीं चूकते कि हम लोग भी कभी रफीक के पढ़ाई में कोई कोताही नहीं बरते। कभी घर के काम में रफीक की मदद न ली। अपना तो कोई खर्चा था नहीं.... जो भी था वह रफीक की पढ़ाई के लिये ही था। रफीक के बारे में बताते बताते भूसे की बोरी, भूसे से कस उठती फिर ग्राहक को बुलाकर बोरे का मुंह पकड़ कर जमीन पर पटकते थोड़ी और जगह बनाते और उसे एक शीशे की तरह चमकते बांस से भूसा कसना शुरू कर देते। बांस भी लगातार बीस-पच्चीस साल खान साहब के हाथों से तराश कर रफीक की तरह चमकीला हो चुका था। फिर खान साहब बताते कि रफीक अब कहता है कि पढ़ाई खतम होने के बाद अपनी क्लिनिक खोलेंगे और आप लोंगों को बढ़िया किराये के फ्लैट में ले जायेंगें........ अब भैया एक-आध साल और भूसे का काम करना है। रफीक दोनों बूढ़ी-बूढ़ा को हज पर भेजने की जिद ठाने हैं। यह बात बताते बताते आभासी स्वप्न की दुनिया में खो जाते खान साहब के चेहरे पर खुशी अपने आप तैर जाती.......
सही भी है जो जीवन का पचास साल शेड और भूसे की तपन में काट दिया हो उसके लिये ऐसे सुखद जीवन की कल्पना भी पांच-दस साल उमर बढ़ाने की दवा से कम न थी।
समय के तो जैसे पंख होते हैं; पता ही न चला कैसे एक साल गुजर गये और  रफीक मियाँ अपनी डाक्टरी की पढ़ाई खत्म करके शहर लौट आये । खानसाहब ने एक दुकान, रफीक के लिये पहले ही नगर निगम से एलाट करा रखी थी। बस डा. साहब का बोर्ड टांगना था और मेज, कुर्सी के साथ डॉक्टरी के लिये कुछ जरुरी सामान.....खान साहब इतने के लिये कब महंगे थे ? सब इन्तजाम कर दिये गये। रफीक बाबू अब डा.रफीक हो गये। अब लड़का डॉक्टर  हो गया तो शादी में कहां अड़चन.... तीन महीने में निकाह भी हो गया। डॉक्टर साहब ने किराये पर तीन कमरे का फ्लैट भी ले लिया।
अब टीन शेड को बांस की टटिया से ढक कर साइकिल वाली सीकड़ से लपेट कर ताला लगा दिया गया। शेड की छत पर नीम की कौड़ियाँ इकट्ठी हो गई। बाहर अब गाय नहीं बंधी थी , हाँ, उनके लकड़ी और टायर वाले खूंटे सुरक्षित गड़े थे। बाहर बड़ा वाला तराजू तो नहीं था लेकिन तराजू लटकाने वाली बल्ली अभी भी मजबूती से गड़ी हुई थी जो बच्चों की शरारत और शक्ति प्रदर्शन से कुछ आगे की तरफ झुक गयी थी। नल का मुंह खोल कर निकाल लिया गया था। सूखा हुआ चबूतरा और काई भी पपड़ी बनकर चिटक चुकी थी। मुहल्ले की बकरियों को भी अब तक यह पता लग चुका था कि खान साहब अब फ्लैट में जा चुकें हैं क्योंकि खान साहब के रहते किस बकरी की मजाल की भूसेखाने में मुंह लगा ले।
ग्राहक भी साइकिल के कैरियर पर बोरा बांध कर पहुंचते और समझ जाते कि खान साहब अब पंखे और छत के नीचे अपने स्वप्नों की दुनिया में लौट चुके हैं। जो नहीं जानते थे उन्हें मुहल्ले वाले बता देते।
अब खान साहब अपने चालीस साल के घुटन भरे भूस के कारोबार, टिनशेड की तपन और ढिबरी के मद्दिम प्रकाश से मुक्त हो चुके थे। ताउम्र उनके कठिन श्रम से की गयी भूसे की कमाई मानो रफीक में साकार हो गयी थी।
खान साहब अपनी चालीस वर्ष की तपस्या के बाद अपने स्वप्निल दुनिया में जा चुके थे, जैसे किसी परिन्दे को उसका घोंसला मिल गया हो। फ्लैट की नई दुनिया जीवन का एक बिल्कुल नया एहसास था..... सुबह से शाम तक ड्राइंगरूम में बैठकर अपनी बेगम से बातें करना.... करीने से बसायी गई नई दुनिया में अपनी पुरानी आदतों को भुलाकर डॉ रफीक के अब्बू-अम्मी कहलाना, उनके लिए भूसे और धुएँ के घुटन की दवा की तरह थी। नयी बहू भी अम्मी-अब्बू का खूब ख्याल रखतीँ थीं और रखें भी न क्यों ? डॉ साहब ने निकाह से पहले ही अम्मी-अब्बू के त्याग के बारे में सबकुछ बता रखा था। शर्त भी थी कि निकाह के बाद अम्मी-अब्बू हमारे साथ रहेंगे।
रफीक के अम्मी-अब्बू ने जो रफीक के लिये अपनी जिन्दगी से समझौता किया था उस त्याग को रफीक की बीबी आखिरकार कब तक समझ पाती। जबरदस्ती की समझदारी और जज्बात की उम्र बहुत कम होती है।
माह न बिता कि डा. साहब की बीबी को अम्मी-अब्बू खांसना और ज्यादा देर तक खामोश रहना भारी पड़ने लगा। खान साहब की चाय लेटलतीफ हो गई। आवाजें तल्ख पड़ने लगीं। डॉ साहब की बीबी अपने कमरे में पड़ी रहतीं और खान साहब अपनी बेगम के साथ बाहरी कमरे की दीवारों और कुर्सियों में कैद रहते। डॉ साहब थक-हारकर क्लिनिक से आते और खाना खाकर अपने कमरे में चले जाते। धीरे-धीरे रफीक भी समझने लगे थे कि पत्नी के लिये अम्मी-अब्बू भारी हो रहे हैं लेकिन करते भी क्या घर में तो उनकी बेगम को ही रहना था। कभी-कभार बेडरूम से तेज़ आवाजें भी खान साहब के कानों तक पहुंचने लगी..... रफीक न जाने क्यों अब्बा-अम्मी की पैरवी में कमजोर पड़ने लगे। रफीक जब बीबी से नाराज़ होते तो अब्बू-अम्मी से भी कटकर रहने लगते। बहुत जल्द ही टिनशेड की घुटन ने फ्लैट में भी प्रवेश कर लिया था। लेकिन दोनों में फर्क था शेड की घुटन तो केवल गले तक ही पहुंचती थी और खांसी आने पर आराम भी मिल जाता था  लेकिन फ्लैट वाली घुटन तो दिल-दिमाग से होते हुए रूह तक पहुंचने लगी थी।  खांस लेने पर भी आराम नहीं मिलता था। पूरी-पूरी रात आंखों में कटने लगी। खान साहब सोचने लगे कि जिसकी खुशनुमा जिंदगी के लिये हमलोगों ने अपनी जिंदगी में घुटन की फिक्र नहीं की आज वह हमारे वजह से घुटन महसूस करे यह कैसे हो सकता....हम लोगों की जिंदगी में बचे ही कितने दिन हैं। यह भी जैसे-तैसे कट जायेंगे। लेकिन रफीक और उसकी बीबी अपनी जिन्दगी तो मनमाफ़िक जी लें।
और अभी एक वर्ष भी न बीता होगा कि अचानक एक दिन शेड का ताला खुल गया। नल का मुंह दुबारा कस दिया गया। रसोई से धुंआ और खांसने की आवाज आने लगी, तराजू संतुलन में आ गया....खान साहब की भूसे की दुकान फिर खुल गयी लेकिन नहीं खुले तो खान साहब.. गाय का खूंटा अभी भी खाली था अब खान साहब के लिये न तो गाय की बात बची और न ही रफीक की। भूसे के दाम में उतार चढ़ाव से कोई मतलब नहीं रह गया था क्योंकि खान साहब के जीवन के एक वर्ष का उतार चढ़ाव कहीं भूसे के दामों में होने वाले उतार-चढ़ाव को बहुत पीछे छोड़ दिया था।
खान साहब अपने बेटे और बहू की कोई बुराई नहीं बताये लेकिन उनकी आंखों की चुप्पी बिन बोले ही सबकुछ कह जाती। खान साहब अब वह पहले से भी शान्त हो चुके थे और ग्राहक भी अब केवल भूसे का ही दाम पूछते पर रफीक की बात न करते। खान साहब का भूसा भरने वाला बांस उनकी हाथों में दुबारा से चमक उठा..... मुहल्ले की बकरियां यह जान चुकीं थी कि खान साहब आ चुके हैं लेकिन बकरियों को उतनी डांट अब नहीं पड़ती थी। आज फिर खान साहब की भूसे की दुकान वैसे ही चटक गई लोग फिर से बोरा लेके दौड़ पड़े, खान साहब की दुकान पर लेकिन खान साहब अब  पहले वाले खान साहब नहीं रहे अब वह केवल भूसा बेचते थे। भूसे के अन्दर छिपा हुआ वह सपना वह फ्लैट में ही छोड़ आये थे। लौट आये थे अपनी खूबसूरत और इज्जतदार  शेड और कारोबार में..
और आज जब मैं खान साहब की खामोशी से बात कर अपने घर की ओर चला तो सहसा मेरे ज़हन में भी एक *रफीक* सवाल बनकर उभरे। मस्तिष्क को झटका देकर उस सवाल को अलग करने की एक असफल कोशिश भी मैंनें की लेकिन वह तीर की तरह मेरे माथे में धंस गये थे। दरअसल यह समस्या खान साहब और रफीक की थी लेकिन खान और रफीक किन्हीं निश्चित व्यक्तियों के नाम तो थे नहीं!! और यही मेरी चिंता का विषय भी था कि इतिहास अपने को दुहरा भी सकता है!!
लेखक
रिवेश प्रताप सिंह
जनपद-गोरखपुर
प्रा० वि० परसौनी

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