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पीपल की कहानी, उसकी जुबानी

पीपल की कहानी, उसकी जुबानी

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मैं समझ नहीं पाता कि तुम्हारी किताबें झूठी हैं या  संवेदनाएँ? कोई एक तो झूठा अवश्य है! क्योंकि तुम पढ़ते हो कि पेड़ सजीव हैं ...पर तुम, न तो मुझे कभी जीवित महसूस करते हो और न ही मुझे अहसास कराते हो कि मैं जिंदा हूँ। तुम अपने बच्चों को पढ़ाते भी हो कि मैं सांस लेता हूँ.....पर कभी तुमने यह करीब से जानने की कोशिश ही नहीं की मैं वास्तव में साँस भी लेता हूँ.... मैं सच में जीवित हूँ, जिंदा हूँ।
मैं यह भी समझ चुका हूँ कि किसी का सांस लेना  ही महज़ उसके जिंदा होने का प्रमाण नहीं। अभी देखो न कल ही हरिया मेरे पास डंडे की टेक लेकर मेरी छांव में आया था और सुनीलवा की दादी से अपनी बुढ़ापे की वेदना बता रहा था....उसकी आंखें और आवाज,उसकी वेदना के प्रतिबिम्ब थे। मैने यह महसूस किया कि कोई व्यक्ति जब अक्षम और बेबस हो जाता है,तो कैसे परिवार और समाज उसे उपेक्षित कर देते हैं।पूरा घर हरिया का ही बनाया हुआ है। इसके एक-एक ईंट और गारे-माटी की तामीर से लेकर सभी की पढ़ाई-लिखाई, रोजगार, विवाह सबका दायित्व हरिया ने ही बखूबी निभाया ! पर आज जब हरिया लाचार है तो उससे कोई नहीं पूछता कि परिवारिक मसलों में उसकी राय क्या है। बेटा और बहू जब घर से हँसते हुए निकलते हैं तो हरिया भी जानना चाहता है कि आज बेटा और बहू इतने प्रसन्न क्यों हैं ! लेकिन किसी के पास इतनी फुर्सत कहाँ कि वो अपनी खुशियों में हरिया को भी हिस्सेदार बना पाएँ। क्या हरिया को इतना भी अधिकार नहीं कि वह भी दो मिनट हँस कर अपनी जिंदगी खुशनुमा कर ले। यह शायद इसीलिये न कि वह अक्षम और अनुपयोगी है? चलने-फिरने में असमर्थ है? और लोग उसे जिंदा कहते भर हैं, कोई महसूस नहीं करता।

अब देखो न कुंदन फोर्स में लग गया, कसी हुई शरीर, चौड़ी छाती, भरे हुए बाजू, सिर पर फोर्स वाली टोपी। कितना गर्व होता है उसे देखकर ! अभी पिछले सोमवार को छुट्टियों में गाँव आया है.....भोर में चौराहे से तीन किलोमीटर पैदल चलकर जब गाँव की सीमा में कुन्दन ने प्रवेश किया तो गाँव के बाहर सिवान में मैं पहला जीवित था जो उसके स्वागत और अभिवादन के लिये खड़ा था। पर उसने तो मेरी तरफ देखा ही नहीं ! नमस्ते-बंदगी तो दूर की बात है। मुझे याद है अपनी फिजिकल परीक्षा की तैयारी में मेरी जड़ों पर हाथ रखकर सैकड़ों सपाट मारता था कुन्दन। और जब दौड़ के लिये निकलता था तो दौड़ समाप्त करने के बाद सर्वप्रथम मेरी ही गोद में बैठकर अपनी सांसों को सामान्य किया करता था । पर आज के दिन जब वह वर्दी पहन कर मेरे पास से गुजरा तो मन हुआ कि मैं खुद ही उसे झुककर सलाम करूँ ! लेकिन कुंदन ने तो मौका ही नहीं दिया ! देखो  कितना बदल गया न...?

लोग कहते हैं कि सुनने वाला-बोलने वाले से कहीं अधिक धैर्यवान होता है। सोचो, पिछले लगभग सवा सौ वर्ष से मैं लगातार केवल सुनते और देखते ही आ रहा हूँ ।इसी गांव के पच्चीस से तीस वर्ष के युवा अपने अनुभव और राजनितिक ज्ञान का दंभ मेरी ही छांव में भरते मिलेंगे और बुजुर्गों के पास तो अनुभवों का खजाना है। सोचिए न कि मेरे पास कितने अनुभव की बातें होगी....... सबको बरस-बरस से सुनता,देखता और समझता आ रहा हूँ। और सिर्फ मनुष्य ही नहीं दूर दराज के पक्षी जब मेरे कंधे और बाजुओं पर बैठकर आस-पास के खबरों की बतरस करते हैं तो वह भी मेरे विराट् अनुभव का ही हिस्सा होता है। लेकिन नहीं होती है तो बस मेरी आवाज़!

पिछले हफ्ते गोपाल अपने इकलौते बेटे बंटी का कान खींच कर मेरे पास से पीटते हुए ले गया। जानते हैं क्यों ? क्योंकि बंटी दोपहर में मेरी ही छाया के नीचे कंचे खेल रहा था.... और गोपाल धूप और कंचे को दोषी बनाकर अपने बच्चे को पीटने लगा। अरे! तुम्हें मेरी छाया पर इतना संदेह है कि मेरे रहते बेटे को धूप लग जायेगी और रही बात कंचे की,तो कंचे में क्या बुराई है? तुम भी तो दिनभर कंचे उड़ाते थे....क्या निशाना था तुम्हारा! और जब वही निशाना तुमने पुलिस की नौकरी में लगाया तो सभी ने तुम पर गर्व किया था। वास्तव में जब तुम भी एक बार में कंचे उड़ाते थे तो मुझे तुम्हारी एकाग्रता और सटीक निशाने पर अडिग विश्वास था कि तुम जीवन के अन्य लक्ष्यों को भी ऐसे ही साध लोगे। खैर! तुम पिता हो,तुम्हें पूरा अधिकार है अपने बेटे को पालने और अनुशासन में रखने का। पर... ऐसे नहीं मारना चाहिए था बंटी को। अभी कितना छोटा है बंटी अभी इतनी समझ कहां है उसमें।


हो सकता है तुम्हारे लिये मैं सिर्फ एक वृक्ष ही हूँ......हो सकता है कि तुम मेरे नाम का प्रयोग सिर्फ लोगों को पता बताने के लिये करते हो कि जब तुम पश्चिम की तरफ आओगे तो तुम्हें एक बहुत विशाल और पुराना पीपल का वृक्ष मिलेगा उसके दाहिने हाथ वाली सड़क पर दो सौ मीटर पर मेरा घर है । कोई बात नहीं...किसी के मार्गदर्शन करने का अवसर भी मेरे लिए सौभाग्य से कम नहीं....मेरे लिये यह भी कम नहीं कि बड़ी-बड़ी पंचायतों का साक्षी रहा हूँ! जिसमें सिर्फ मनुष्य ही नहीं पशु-पक्षी भी शामिल हैं।. झूठ को मुकुट पहनाते और सत्य को छटपटाते-कुचलते हुए देखा है मैंने...बड़े-बड़े स्वांग और व्यूह रचना का मूक दर्शक और श्रोता हूँ....कितनों के जीवन के रहस्यों का एक मात्र राज़दार ! अभी पिछले महीने प्रभुनाथ का बैल चोरी हुआ था । सभी लोगों का शक झिनकूवा के बेटे सुरेश पर गया लेकिन मैं जानता हूँ कि वह निर्दोष है। बैल खोलकर ले जाने वाले का नाम तो मैं नहीं जानता लेकिन इतना तो जरूर है कि वो आस-पास के गांव जवार का नहीं है,क्योंकि इधर का कौन है जिसे मैं नहीं जानता।
तुम लोग तो केवल दो चार लोगों से अपनी बात करते हो और पूरे गांव की खबर रखते हो और मैं सबके साथ बैठता हूँ सबकी सुनता हूँ, सबको देखता-समझता हूँ..... बाप की झुंझलाहट,मां की पीड़ा...बेटे के रोजगार की बेचैनी..... बिटिया के विवाह की चिंता... गांव का झगड़ा,प्रेम, भाईचारा.... चुनाव की तैयारी.....दहेज की व्यवस्था.... बारातियों का स्वागत... खेत-खलिहान की आग, मृत्यु का शोक,चेचक, प्लेग, बाढ़, आंधी-तूफान यह सब तो आंखों के सामने से गुजरता रहा है.......सारी बातें एक किताब कि तरह मेरे हृदय में छपती रही हैं। न जाने कितने बच्चों के जन्म और उसके उपरांत सोहर मंगल के गीत.....विवाह के मंगल गीत, उमंग-उत्साह!  मटमंगरा, परछावन, विवाह, नाच, बैंडबाजा जैसे खुशियों को महसूस करता रहा हूँ।
कुछ हृदय विदारक घटनाएँ भी झकझोर देती हैं कि अचानक जब लोग मेरे बगल वाले पेड़ से बांस काटते हैं तो दिल थम सा जाता कि कौन मेरा प्रिय मुझसे आज विदा ले रहा है... मन को मनाता हूँ कि शायद कोई अपनी छान या खटिया के लिये बांस काट रहा हो लेकिन ऐसा कम ही होता है और दो घंटे में टिख्टी पर सुलाई हुई शरीर और गांव भर की महिलाओं का करुण-क्रंदन मेरे हृदय को बेध देती हैं। पर सब कुछ सहना है..चुप रहना मेरी नियति है...

लोगों की कितनी आस्थाएँ भी जुड़ी हैं मुझसे.....माताएं,बहने बेटियाँ अपनी मनोवांक्षित कामना के लिये मुझे धागे बांध कर एक दायित्व सौंप जातीं हैं और मैं सालों साल उसको सहेजकर रखता हूँ और महिलाएं जितनी बार मेरी ओर से गुजरती हैं तो हर बार मेरी तरफ देखती हैं और मैं हर बार उनको उसी विश्वास के साथ धागे से लिपटा हुआ मिलता हूँ। मुझे ठीक से याद है.....लगभग पच्चीस साल पहले तीरथ लोहार और रामू बनिया में दो सौ रूपये के लेन-देन में विवाद हो गया....रामू का आरोप था कि तीरथ ने खेती के समय दो सौ रूपये उधार लिये और वापिस नहीं किये.... और तीरथ अड़ा था कि हम उनकी मेहरारू को रूपिया लौटा दिये हैं। बात बढ़ती गई .....नौबत मारा-पीटी की आ गई । आखिर में पंचायत बैठी....रामू बनिए ने पंचायत में एक शर्त रक्खी की "अगर तीरथ पीयरी पहिन कर पीपर के पेड़ के नीचे भगवान वासुदेव की सौगंध खा लें तो मैं यह मान लूंगा कि उन्होंने पैसे वापस कर दिये थे।" तीरथ ने शर्त मंजूर किया ..नहा धो और पीयरी पहिन कर आये और खा ली सौगंध ! और वहीं फैसला हो गया... रामू की आस्था ने उसकी स्मृति को भी जीत लिया। मेरे लिये भी वह सम्मान का दिन था क्योंकि मुझे भी नहीं पता था कि तीरथ ने पैसे दिये थे कि नहीं ! किन्तु उनकी आस्था से मैं उपकृत हुआ। जमाना बदला...जीवन-मूल्य बदले। अब न वैसे लोग रहे और न ही वैसा विश्वास!
हां.....मेरे शरीर पर लोग घंट बांध कर अपने पितरों की आत्माओं के पानी पीने का दायित्व अवश्य सौंप जाते हैं और मैं सभी पितरों की प्रतीक्षा में पूरी रात सोता नहीं हूं कि कोई आत्मा नाराज होकर न चली जायें... मुझे यह भी पता है कि लोग केवल घंट बांध कर भूल जाते  हैं.... पर मैं कैसे भूल सकता हूँ! घंट से टप टप करती पानी की बूंदें मेरी आत्मा को भी विश्राम नहीं देतीं। क्योंकि मेरे सम्बन्ध स्वार्थ पर नहीं टिके हैं मुझे किसी से कोई आशा नहीं रखनी है मुझे तो केवल अपने सम्मान की रक्षा करनी है कि आपने इतने वृक्षों के बीच में मुझे यह दायित्व सौंपा।
"मैने भी अपने जीवन में बहुत परिवर्तन देखें हैं...गुलामी की बेड़ियों से आजादी का उन्मुक्त आकाश देखा है तो उसकी कीमत अदा करते वीर बलिदानी भी देखे हैं ...नेताओं के झूठे सतरंगी सपनों और वायदों का भारत देखा है तो एक बड़ी आबादी का आजादी से मोहभंग भी!...दाग दाग उजाला!! इसमें सर्वाधिक नुकसान गाँवों का हुआ। रोटी,रोजगार के लिए गाँवों से पलायन करते युवा देश के ही  नहीं मेरे माथे के भी घाव हैं! ताश की पत्तियों और ताड़ी शराब में डूबते गांव को देखकर मन व्यथित हो जाता है.....
मोबाइल की दुनिया में खोता बचपन......झूठ, दिखावे और कर्जे से लदी जिंदगी में जवानी में खोती हुई निश्छलता और सहजता..... अंधी दौड़ में लोगों से आगे निकलने की ललक.... गुम होती मुस्कुराहट.....
यह सब मेरे आंखों के सामने घटता है और मैं चुप रहता हूँ.... क्योंकि मैं एक बूढ़ा वृक्ष हूँ....... पर  जीवित हूँ..... जिन्दा हूँ और आपके साथ हूँ।मैं आपका प्रहरी बहुत पुराना बूढ़ा पीपल हूँ।
मैं आंधी तूफान को झुक कर सह लेता हूँ अपने पांव उखड़ने नहीं देता क्योंकि मेरी जिम्मेदारी है कि मैं आपकी आगे की पीढ़ियों के लिये शीतल छाया दे सकूँ। मुझे तो बड़े तूफानों से भी डर नहीं लगता क्योंकि मुझे अपने पैरों की मजबूती पर विश्वास है......मुझे तो डर मेरे अपनों से लगता है जो जड़ों पर प्रहार करते हैं...... जिन्हें अपने भौतिक सुखों के लिये मेरे अस्तित्व को जड़ों से उखाड़ने में तनिक भी संकोच नहीं लगता। आज जब मैं अपनी आंखों के सामने कितने वृक्षों को केवल ठूंठ बनकर जानवरों को बांधने के लिये एक खूंटे की तरह जमीन में धंसे देखता हूँ तो मेरा हृदय बैठ जाता है.... और मुझे भी किसी कैवल्य की चाह नहीं। मैं तो बस इतना सोचता हूँ कि जब तुम मेरी जड़ों पर कुल्हाड़ी चलाओ तो मेरी जड़ों को भी खोद देना क्यूंकि मेरे भीतर इतना साहस नहीं कि मैं एक ठूंठ बनकर खड़ा रहूँ और लोगों की बातें सुनूँ कि  यहां एक विशाल सवा सौ वर्ष पुराना पीपल का वृक्ष हुआ करता था........

(पर्यावरण दिवस पर विशेष)


रचनाकार
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रिवेश प्रताप सिंह

जनपद गोरखपुर
के प्रा० वि० परसौनी में कार्यरत हैं।



2 comments:

  1. किसी को महसूस कर लिखना का जो कौशल आप में है, वो वाकई बहुत ही काबिलेतारीफ है। आप द्वारा वृक्ष को आत्मसात कर जो भी लिखा गया उसकी वास्तविक तस्वीर को तहे दिल से नमन करता हूँ।
    आपकी लेखनी को कोटिशः सलाम

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  2. पीपल वृक्ष की भावना पर आधारित सशक्त प्रस्तुतीकरण निश्चित रूप से पर्यावरण दिवस जैसे दिन की प्रासंगिकता सिद्ध करता है।

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