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दुनिया बदल रही है

दुनिया बदल रही है मंज़र बदल रहा है।
मंज़िल नहीं है कोई हर शख़्श चल रहा है।
रंगीं फ़िज़ां की जानिब बेख़ौफ़ दुनिया दौड़े,
आतिश को देख जैसे बच्चा मचल रहा है।
इंसानियत का देखो क्या ख़ूब ये तमाशा,
पत्थर को पूज इन्सां लाशें निगल रहा है।
जाने ख़ुदा इसे या जाने कोई दीवाना,
तूफ़ान क्यूँ उठा है क्यूँ दिल ये जल रहा है।
पहचान आज खोई रूहे वतन की यारों,
हिन्दू यहाँ तो कोई मुस्लिम टहल रहा है।
अल्फ़ाज़ आज मीठे लब पर सजे उसी के,
जिसका यहाँ किसी से मतलब निकल रहा है।
तू जानता है बेशक़ कुछ भी न कर सकेगा,
निर्दोष दिल ये तेरा नाहक़ उबल रहा है।
रचना- निर्दोष कान्तेय 

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