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कभी न राह छोड़िये

सुनो कभी बहार से,
ख़ज़ाँ न पार पा सकी।
रहे न तीरगी सदा,
कली खिले उजास की।
मुसीबतों भरी कथा,
हरेक आम ख़ास की।
कभी न राह छोड़िये,
निराश हो प्रयास की।
(ख़ज़ां- पतझड़, तीरगी- अँधेरा)
रचना- निर्दोष कान्तेय
काव्य विधा- पञ्चचामर छंद

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