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दीपदान

दीपदान 
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 आदिकाल से सनातन धर्म में अपने  पित्रों और मृत स्वजनों की आत्मा की शान्ति और सद्गति  के लिए कार्तिक मास की पूर्णिमा को दीपदान करने की परम्परा है । इस वर्ष कोरोना महामारी ने अनेक लोगों को असमय ही काल -कवलित कर दिया । जिसमें हमारे बेसिक शिक्षा परिवार के भी अनेक शिक्षक -साथी और उनके परिजन सम्मिलित हैं । उनकी आत्मा की शान्ति और सद्गति की कामना करते हुए ये भावांजलि उन्हें समर्पित है --- 

काल की नदी में ,
परम्परा का प्रवाह,
नदी की धार में है,
दीपों का ज्वार  ।

घनीभूत नीरवता ,
जगमग नदी तट ,
डूबता उतराता है,
आस्था का दीप । 

अब सिसकियाँ नहीं ,
बस सर्वत्र मौन है , 
ये दीप कब पूछते हैं,
परस्पर हम कौन हैं ।


यात्रा का अन्तिम छोर,
है नम आँखों की कोर ,
पी जीवन का कालकूट,
खोजते मुक्ति का द्वार  । 

अपलक निहार ,
गङ्गा की धार  ,
ये आया विचार,
क्षणभंगुर संसार।  


           प्रदीप तेवतिया 
           एआरपी,हिन्दी 
           सिम्भावली, हापुड़। 
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 आदिकाल से सनातन धर्म में अपने  पित्रों और मृत स्वजनों की आत्मा की शान्ति और सद्गति  के लिए कार्तिक मास की पूर्णिमा को दीपदान करने की परम्परा है । इस वर्ष कोरोना महामारी ने अनेक लोगों को असमय ही काल -कवलित कर दिया । जिसमें हमारे बेसिक शिक्षा परिवार के भी अनेक शिक्षक -साथी और उनके परिजन सम्मिलित हैं । उनकी आत्मा की शान्ति और सद्गति की कामना करते हुए ये भावांजलि उन्हें समर्पित है --- 

काल की नदी में ,
परम्परा का प्रवाह,
नदी की धार में है,
दीपों का ज्वार  ।

घनीभूत नीरवता ,
जगमग नदी तट ,
डूबता उतराता है,
आस्था का दीप । 

अब सिसकियाँ नहीं ,
बस सर्वत्र मौन है , 
ये दीप कब पूछते हैं,
परस्पर हम कौन हैं ।


यात्रा का अन्तिम छोर,
है नम आँखों की कोर ,
पी जीवन का कालकूट,
खोजते मुक्ति का द्वार  । 

अपलक निहार ,
गङ्गा की धार  ,
ये आया विचार,
क्षणभंगुर संसार।  

✍️
 प्रदीप तेवतिया 
 एआरपी,हिन्दी 
 सिम्भावली, हापुड़।

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