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सशक्त नारी

सशक्त नारी


तोड़ के हर बंधन,
बंद पिंजरे से उड़ जाऊंगी।
 बंदिशों के हर पहरे मैं,
पल में तोड़ गिराऊंगी।
 ऊंचे अंबर के पहलू में,
अपनी जगह बनाऊंगी।

अभी बंधे हैं पैर मेरे,
तुच्छ विचार रूढ़िवादी जंजीरों में,           
तोड़ इसे आगे बढ़ एक दिन,
हर एक को दिखलाऊंगी।

 कहां अब दिखती मुझ में, 
किसी रूप में लाचारी।
 हर देश हर भेष में,
अब शक्तिशाली नारी कहलाऊंगी।

नारी सशक्तिकरण की गूंज उठ रही है।
 वसुंधरा पुलकित हो खिल रही है।

 अपमान न अब करना 
नारी जननी जगदाता है।
पुरुष जो अपमान करें आखिर,
 वो भीं इनकी गोदी में पलता है।

 ऊंचे नीचे संघर्षों से,
 टकराना मुझको भी आता है।         
नारी हूं मुझको भी, 
मुश्किलों से लड़ना आता है।

 पथरीली राहों पर चलने का,      
    साहस मैं भी रखती हूं।
हर अनुत्तरित प्रश्नों का,
मन में उत्तर रखती हूं।

जुनून ,लगन ,बुलंद हौसले ,
मेरे अंदर भी जीवित  हैं।
तम को दूर प्रकाश भरने की,                 
  क्षमता मेरे भी अंदर है।

सबकी खुशियों के लिए,
 मैं समर्पित रहती हूं।
जन्म दात्री हूं मैं
 हां गर्व मुझे मैं जननी हूं।

विशाल सशक्त भारत की,
मैं सशक्त नारी हूं।
गर्व है मुझको मैं नारी हूं।।

✍️
दीप्ति राय दीपांजलि 
सहायक अध्यापक
कंपोजिट विद्यालय रायगंज खोराबार गोरखपुर



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