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पेंशन



थे मसीहा कल के,
आज भी आप नगीना हैं।
देश हित की बात कर,
पेंशन हमसे छीना है।।

हमें छेड़ अपना नहीं छोड़ा,
समता की बेड़ी आप ने तोड़ा।
कैसी है यह नीति सियासत,
मुखिया हो मुख हमसे मोड़ा।।

आप क्या जानो दर्द हमारी,
हक हमारा छीना है।
'पुष्कर' की तो बात बेमानी,
दुष्कर अंत समय का जीना है।।

एनपीएस की बात जो करते,
शायद खुद अपनाया होता।
अखण्ड विरासत अपनी है,
शायद ये बतलाया होता।।

आपने भी गर त्यागा होता,
उन्नत सारा कोष होता।
तुल्य व्यवस्था हम जो पाते,
क्षीण हमारा रोष होता।।

आज उन्हीं की है प्रभुताई,
जरा की जिसने चीर चुराई।
वो क्या जाने पीर पराई,
जाके पैर न फटे बिवाई।।


✍️अलकेश मणि त्रिपाठी "अविरल"(सoअo)
पू०मा०वि०- दुबौली
विकास क्षेत्र- सलेमपुर
जनपद- देवरिया (उoप्रo)

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