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सांझ

खुशनुमा नज़ारे 
शान से ढलती शाम,
सूरज की झुकी किरणे 
शशि को कर रही प्रणाम,
लहलहाती वृक्षों की डालियाँ
शर्म से मुख छुपाती कलियाँ,
खिलखिलाते नन्हे अधरों सहित
गलियों में खेलता बचपन,
चहकते समूह में लौटते पक्षी
अपने नीडो की ओर ,
तेज कदमों से 
चारागाहो से लौटते मवेशी,
चंद सुकून के क्षण पाने को
वापस घर लौटते इंसान,
सब बता रहे इन आखों को
अभी अभी हो गई सांझ ।

(पूजा तिवारी)

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