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सहयोग

साक्षी ने अपने दो चार साथियो के साथ मिलकर कालेज में एक छोटी सी आर्गेनाइजेशन बनाई और उसका नाम रखा "मैत्री"।उसके आर्गेनाइजेशन बनाने का उद्देश्य यह था कि वह नये नये सामाजिक मुद्दों पर छात्रों की राय जान सकेगी साथ ही इससे छात्र आपस में इन्ट्रैक्ट भी हो सकेंगे। उसने संगोष्ठी आयोजित करने के लिए सबसे पहले परिचर्चा का विषय और तारीख तय की और फिर छात्रों और शिक्षकों को आमंत्रित करने में जुट गई। हालांकि सभी उसके इस प्रयास की तारीफ़ करते पर कोई भी सहयोग करने को तैयार नहीं होता या फिर ऐसा ढीला -ढाला जवाब मिलता कि उसका उत्साह धरा का धरा रह जाता। फिर भी वह अपने बिखरे उत्साह को समेट अपने काम में लगी रही । अंततः विभाग के एच.ओ.डी. उसके कार्यक्रम मे आकर सहयोग करने को तैयार हो गए। उसकी खुशी का ठिकाना न रहा ।वह बेसब्री से संगोष्ठी के दिन का इंतजार करने लगी।

आखिर वह दिन आ ही गया। साक्षी सबसे पहले डिपार्टमेंट पहुच गई ताकि सारी व्यवस्था देख सके। सारा सामान आ चुका था माइक, पेपर पेन,नाश्ता और उसके सब साथी भी आ चुके थे। तय समय धीरे धीरे बीत रहा था कि तभी साक्षी को विभागाध्यक्ष कुछ छात्रों के साथ के साथ आते हुए दिखे वह खुशी से उनके स्वागत के लिए आगे बढ़ी पर यह क्या वह सब उसकी तरफ न आकर दूसरी तरफ के हाल की ओर मुड़ गये जहाँ पहले से ही फेयरवल पार्टी चल रही थी। संगोष्ठी वाला हाल अभी भी पूरा खाली था और बगल के हाल मे भीड़ लग चुकी थी और वहाँ स्पीकर में बज रहे गाने आज ब्लू है पानी पानी...... का पानी साक्षी की आखों में आकर न जाने कब तैरने लगा।

4 comments:

  1. खाने पीने का प्रबंध सबको लालायित करता है :p

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  2. वक़्त की रंगरलियों से इतर वैचारिक विमर्श का समय किसके पास? यही है आज का ढब... और तथाकथित विकसित होता समाज....

    सुन्दरता से परिलक्षित किया है आपने.... वाह!!

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  3. यही तो समस्या है कि नई पीढ़ी मुद्दों से दूर भागी जा रही है । cheer

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