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गौरैया और बिटिया ........(जो अब बड़ी हो गयी है)

🐥 गौरैया और बिटिया ........(जो अब बड़ी हो गयी है )👧

जब बचपन था ,
मैं भी सोचती थी
तुम्हारी तरह उड़ना ...
फुदकना
ची-चू करके 
फर-फर करना।
खुले आसमां में 
दूर तक विचरना।

इधर फुदकना , 
उधर को उड़ना ..
उधर फुदकना ,
इधर को उड़ना।
दाने चुगकर ,
उड़ते रहना
भूख लगे तो 
फिर से चुगना

क्या बचपन था !

हर आँगन हर मुंड़ेर
अपने थे 
बाग भी अपने ,
हर खेत भी अपने थे।
तुम्हारे और मेरे
मन की उड़ान ...
एक सी थी।

तुम थी नाजुक ...
मैं भी कोमल।
पर ....
तुम भी मगन
मैं भी मगन।

तुम तिनकों से
झरोखे सजाती थी ,
मैं मिट्टी के
घरौंदे बनाती थी।
न थी तुम्हें कोई चिन्ता
न मुझे कोई गम।
पर वक्त बीता .....
हालात बदल गए
तुम्हारे पंख ...
नाजुक थे ,
मजबूत हो गए।
और मेरे .........
कुतर दिए गए।

नहीं , सखी !
ऐसा नहीं है ...
तुम्हारे अपने
तुम्हारे संग हैं ,
और मैं......
बिछड़ती जा रही हूँ .....
तुमसे।
और उजड़ता जा रहा है
मेरा आँगन।
मैं  .......
नन्हीं गगनपरी ,
कर भी क्या सकती हूँ ?

नन्हीं गौरैया !
तुम सही कह रही हो 
मुझे भी एहसास हुआ
20 मार्च को ......
जब... तुम तो नजर नहीं आयी ,
नजर आये तो सिर्फ और सिर्फ 
तुम्हारे चित्र .....
वास्तविकता से परे।

सखी ! मैं खामोश हूँ ..
क्योंकि 
मेरे विनाश में ही छिपी हैं ,
तुम्हारी खुशियाँ।
ये ऊँचे-ऊँचे 
राझसरूपी लौहस्तम्भ
जो ला दिए हैं ...
तुम्हारे अपनों को ,
तुम्हारे 
बहुत नजदीक , 
किन्तु ....

किन्तु क्या,नन्हीं गौरैया ?

किन्तु ,
बढा दिए  हैं
तुमसे
और इस धरती से मेरी दूरी।
न तुम्हें ज्ञात था ,
न मुझे आभास था
कि मेरा अस्तित्व
खतरे में है
और तुम्हारा भी हाँसिए पर।

तुम सही कह रही हो
नन्हीं गौरैया
और हमारा नाम भी
एक सा है
तुम चिड़िया
और मैं .... बिटिया।
लेकिन अब मैं...
तुम सा नहीं होना चाहती।
अब मैं अपना अस्तित्व,
नहीं खोना चाहती ,
नन्हीं गौरैया !
तुम्हारा
उजड़ा हुआ आँगन
मैं बसाऊँगी
अपने अपनों से
दूरियाँ बढाकर।

प्रतिभा गुप्ता
(सहायक अध्यापिका)
उच्च प्राथमिक विद्यालय
खेमकरन, विजयीपुर
जनपद - फतेहपुर

2 comments:

  1. बहुत सुंदर लिखा है विषय की बहुत अच्छी समझ है

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