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ईद आई

चाँद का दीदार हुआ।
ईद आई ईद आई।                                
'कहकशा' में हलचल होई।                      
ईद आई ईद आई                                                 
चाँद का दीदार हुआ                                              
ईद आई ईद आई                                       
'आफताब'और 'महताब'भी रोशन हुए।            
ईद आई ईद आई                                             
चाँद का दीदार हुआ
ईद आई ईद आई                                               
सारी 'अंजुमन' गुलज़ार होई                           
ईद आई ईद आई                                                
चाँद का दीदार हुआ                                            
ईद आई ईद आई                                             
मजहब की दीवार टूटी
ईद आई ईद आई                                              
चाँद का दीदार हुआ                                     
ईद आई ईद आई                                                 
दिलों की नफरतों को भूल गले मिलों।              
ईद आई ईद आई����������…
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सुन कश्मीर हमारा है।

देशद्रोह ने स्वर्ग धरा का,
क़ब्रिस्तान बना डाला।
वादी में आख़िर क्यों छाया,
दहशत का साया काला।
अपने वीर जवानों की हम,
कब तक क़ुर्बानी देंगे।
ग़द्दारी की ज़हर बेल को,
पोसेंगे- पानी देंगे।कौन बो रहा बीज द्रोह के,
कौन मिला ग़द्दारों से।
कौन दिशा देता है उनको,
दुश्मन के गलियारों से।
कौन प्राण का मोल लगाकर,
तोल रहा हथियारों से।
सज़ा मिले ग़द्दारों को अब,
कहना है सरकारों से।हमने ही वो नाग  विषैले, 
आस्तीनों में पाले हैं।
उजले कपड़े धारण करते,
पर अंदर से काले हैं।
मासूमों का ख़ून बहाकर,
गले तलक जो डूबे हैं।
मिलकर हमे निबटना होगा,
जो उनके मंसूबे हैं।मुल्क़ हमारा दुश्मन है वो,
लेकिन बाप तुम्हारा है।
भारत छोड़ो ग़द्दारों तुम,
दुश्मन तुमको प्यारा है।
तुम जैसे श्वानों ने फिर से,
सिंहों को ललकारा है।
वक़्त अभी भी ज़रा सँभल जा,
सुन कश्मीर हमारा है।रचनाकार- निर्दोष कान्तेय
काव्य विधा- ताटंक छन्द

लौह से जब हों इरादे

घाव जो अपने कभी दें अश्क़ तब चुकते नहीं।
जान लेकर छोड़ते हैं वे फ़क़त दुखते नहीं।साथ अपनों का रहे सिर पर ख़ुदा का हाथ हो,
मुश्किलों के सामने हम हारकर झुकते नहीं।कब भला अंजाम पाईं तीरगी की साज़िशें,
आँधियों के ज़ोर से सूरज कभी बुझते नहीं।फूल देकर इस जहां को ढूंढ लेता है ख़ुशी,
बाग़बां के हाथ में कांटे तभी चुभते नहीं।लौह से जब  हों इरादे हौसला पर्वत सा हो,
मंज़िलें मिलने से पहले पाँव फिर रुकते नहीं।ग़ज़लकार-निर्दोष कान्तेय
वज़्न- 2122 2122 2122 212

दृष्टिकोण

उन्हें सफलता की चमक लुभाती है।
हमें सार्थकता की महक सुहाती है।
उन्हें चौड़ाई में पसरने की दरकार है।
हमें गहराई में उतरने से प्यार है।
उन्हें अमीर बनने का जुनून है।
हमें ज़मीर बचने का सुकून है।
उन्हें बाहर पड़ा माल जुटाना है।
हमें भीतर सोया बीज उगाना है।
उन्हें अपनी तीव्र बुद्धि पर विश्वास है।
हमें अपनी चित्त-शुद्धि से आस है।
उन्हें कुछ बन के जहान को दिखाना है।
हमें कुछ कर के भगवान को रिझाना है।
रचनाकार
प्रशांत अग्रवाल
सहायक अध्यापक
प्राथमिक विद्यालय डहिया
विकास क्षेत्र फतेहगंज पश्चिमी
जिला बरेली (उ.प्र.)

योग गंगा में नहाएं

योग की गंगा बही रे चली जाय
सब नहा लो आय,
सब लोग कर लो आय
गहरी सांस भरो और गहरी सांस छोडो
तीन मिनट तक भस्तिका प्राणायाम कर लो
फेफडो को लो शुद्ध बनाय
सब नहा.........
खाली पेट, पेट मे स्ट्रोक मारो
पन्द्रह मिनट कपाल भाँति कर लो
मधुमेह मोटापा दूर भगा लो
चेहरे को अपने लेव चमकाय
सब नहा लो आय
मुट्ठी से मुट्ठी मिलाओ, अंगूठे से अंगूठा
दो हाथ सामने फैला लो
अपने हृदय की मालिश करा लो
हृदयाघात से लेव बचाय
सब कर लो आय
दाएँ हाथ से दाहिना नासिका द्वार बन्द कर लो
बायीं नासिका से गहरी सांस भर लो
थोड़ी देर फिर सांस रोक लो
दायी नासिका से फिर देव निकाल
अनुलोम - विलोम प्राणायाम है ये
नाडी शोधन का अच्छा उपाय
सब नहा लो आय
भ्रामरी, उद्‌गीथ मे ऊँ नाद होता
मन की चंचलता जो दूर करता
अवसाद से छुटकारा मिलता
प्रणव ध्यान मे अपने को दो रमाय
सब कर लो आय
बाह्य प्राणायाम मे तीन बन्ध लगा लो
जालन्धर बन्ध, उड्यान बन्ध, मूल बन्ध
ये तीनो याद कर लो
नौलि क्रिया इसके साथ ही कर लो
उदर गत समस्या फिर न रहने पाय
आओ सब लेव.........
हिचकी जैसी आवाज गले से निकालो
थायराइड बीमारी को दूर भगा लो
गले सम्बन्धी विकृतियों से छुट्टी मिल जाय
आओ…