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मेरा विद्यालय

घर आँगन सा है प्यारा ,              
मेरा विद्यालय सबसे न्यारा।     
जब यहाँ पर मैं आई थी ,            
जान न किसी को पाई थी।          
भाषा भी थी कुछ अलग अलग,   
बच्चे आते थे बदल बदल।         
देख सिर मेरा चकराया था,        
समझ में कुछ न आया था।
कुछ खो जाए कहते बह गयी ,    
मैं समझी कोई नदी पड़ी।           
कोई बच्चा यदि न आता ,           
कहते टेर लाएं क्या।                  
टेर मैने कब मंगाया था?            
सुन सिर मेरा चकराया था,         
समझ में कुछ न आया था।  
अगले दिन वह आया निकल ,    
पूछा क्यों नही आया कल।        
कहता मूड़ पिराता था,                
न जाने कौन सा रोग बताया था।
तब सिर मेरा चकराया था,          
समझ मे कुछ  न आया था।     
स्कूल ड्रेस क्यों न पहनी तुमने?  
कहते वो तो फीचि पड़ी।            
सुन-सुनकर उनकी बातें,            
मै तो यूँ ही स्तब्ध खड़ी।              
तब सिर मेरा चकराया था,         
समझ में कुछ न आया था।         
पर आज बदल गये हालात हैं ,   
वो सब मेरे साथ हैं।                   
मेरी डांट भी उनको प्यारी ,        
उनकी बातें …
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ख़्वाब तुम रखो

आसमाँ छूने का,भले ख़्वाब तुम रखो,
मगर ज़मीं से भी नाता,लाजवाब तुम रखो।
तुम्हारी कोशिशें भी,एक दिन रंग लायेंगी,
बस अपने दिल में हौंसले,बेहिसाब तुम रखो।
बुज़ुर्गों की भी हालत पे, ज़रा तुम ग़ौर फ़रमाना,
ख़यालों में अपना जब भी, शबाब तुम रखो।
कुछ सवालों को तुम,अनसुना भी कर देना,
ज़रूरी नहीं कि सबका, जवाब तुम रखो।
उजाले के लिए तो एक दीपक,बहुत होता है,
क्या फ़ायदा ग्रहण लगा, आफ़ताब तुम रखो।
हर इंसान में भगवान की छवि नज़र आयेगी,
नज़रिया अपना बस,ना ख़राब तुम रखो।
आज के दौर में ये भी ज़रूरी,हो गया 'राहुल'
कि कभी-कभी चेहरे पर नक़ाब तुम रखो।
लेखक
राहुल शर्मा,
सहायक अध्यापक,
पूर्व माध्यमिक विद्यालय कुंभिया
शिक्षा क्षेत्र - जमुनहा,
जनपद - श्रावस्ती।

शिक्षक हूँ

शिक्षक हूँ...

      लड़खड़ाते पैरों को
      चलने योग्य बनाता हूँ,
      तुतलाती ज़ुबानों को
      बोलना सिखाता हूँ
      दादा व दादी की
      कहानियाँ सुनाता हूँ
      शिक्षक हूँ
      राष्ट्र की नींव बनाता हूँ

      भारत माँ का आँचल
      सप्तरंगों से सजाता हूँ,
      नौनिहालों के भविष्य का
      छायाचित्र बनाता हूँ
      केसरिया और हरा में
      मिट्टी की महक मिलाता हूँ,
      चित्रकार हूँ
      भारत की तस्वीर बनाता हूँ

      क्रुद्ध व अशांत मन पर
      चन्दन का लेप लगाता हूँ,
      भले-बुरे कर्मों का
      परिणाम-चित्र दिखाता हूँ
      भटके कर्णधारों को
      रास्ता बतलाता हूँ,
      मार्गदर्शक हूँ
      समाज को बुराइयों से बचाता हूँ

      प्रकृति और सृष्टि के
      रहस्य को समझाता हूँ,
      जीव और जगत के
      सम्बन्धों को दर्शाता हूँ
      जन्म और मरण की
      पहेलियाँ सुलझाता हूँ,
      दार्शनिक हूँ
      जिंदगी का फलसफ़ा बतलाता हूँ

      बाहर से चोट करके
      अंदर से बचाता हूँ,
      दोराहे पर खड़ा होकर
      फ़र्ज अपना निभाता हूँ
      कभी दे दूँ डाँट
      कभी प्य…

आया है पन्द्रह अगस्त

आया है पन्द्रह अगस्त आया है पन्द्रह अगस्त !
आओ बच्चों झूँमों नाचो खुशियाँ मनाओ मस्त !
आया है पन्द्रह अगस्त आया है पन्द्रह अगस्त !
अशफ़ाक़ बिस्मिल फांसी चढ़ गए, मारा उधम ने डायर !
आज़ादी के दीवानों पर हुए हज़ारो फायर !
देख वीरता इन वीरों की अंग्रेज़ हो गए पस्त !
आया है पन्द्रह अगस्त आया है पन्द्रह अगस्त !
सत्य अहिंसा के थे पुजारी बापू गांधी !
देश की हवाएँ चला रही थी आज़ादी की आंधी !
बिन हथियार गोला चलाये किया दुश्मन को त्रस्त !
आया है पन्द्रह अगस्त आया है पन्द्रह अगस्त !
नेता जी ने देश की खातिर हमसे माँगा खून !
आज़ादी के मतवाले जेल गए रंगून !
हुआ इसी दिन देश में अंग्रेज़ो का सूर्य अस्त !
आया है पन्द्रह अगस्त आया है पन्द्रह अगस्त !
प्यारे बच्चों आओ आओ मिलकर पढ़ो पढ़ाओ !
पढ़ लिखकर विद्वान बनो तुम देश का मान बढ़ाओ !
देश की उन्नति की खातिर हरदम रहो व्यस्त !
आया है पन्द्रह अगस्त आया है पन्द्रह अगस्त !
रचयिता 
आमिर फ़ारूक़
सहायक अध्यापक
उच्च प्राथमिक विद्यालय औरंगाबाद माफ़ी
विकास क्षेत्र सालारपुर
जनपद बदायूँ

लहू तुम्हारी छाती से

नहीं डरेंगे हिंदुस्तानी तेरे एटमी हथियारों से ।
निपट लेंगे हम अंदर और बाहर के गद्दारों से ।
    कान खोलकर ड्रैगन सुन ले,
    सही  राह  अब  से  चुन  ले,
    हिंदुस्तान कह  रहा शान से,
    हटाले सैनिक  डोकलाम से,
    उसके बाद  होगी मुलाकात,
    तभी  करेंगे  मन की  बात ,
वरना कुछ नहीं होगा तेरे पालतू अखबारों से।
निपट लेंगे हम अंदर और बाहर के गद्दारों से ।
    सुन ले तू भी पाकिस्तान,
    कितना  है  रे  तू नादान,
    ड्रैगन के बाहों में झूल गया,
    पैंसठ और एकहत्तर भूल गया,
    उखाड़ फेंका था तुझे कारगिल की घाटी से,
    अब की बार पिएंगे "लहू तुम्हारी छाती से",
"बांध लें बिस्तर" कह दो अपने आतंक के दुकानदारों से।
निपट लेंगे हम अंदर और बाहर के गद्दारों से।
    पत्थरबाजों होश में आओ,
    पढ़ लिख कर कुछ नाम कमाओ,
    सेना पर पत्थर फेंकना बंद करो।
    पांच सौ में खुद को बेचना बंद करो,
    उखाड़ फेंको इन लोकतंत्र के हत्यारों को,
    तोड़ डालो तीन सौ सत्तर के दीवारों को,
वरना भीख मांगते रहोगे जीवन भर सरकारों से।
निपट लेंगे हम अंदर और बाहर के गद्दारों से।
    जब जब आतंकी पकड़े…