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मेरी छोटी से प्रेम कहानी

स्टेशन पर गाड़ी का इंतज़ार बहुत बोझिल होता है खासकर जब आस पास सुन्दर सवारियाँ ना हों ।मुझे भी ट्रेन से फतेहपुर जाना था वाया कानपूर।पैसेंजर ट्रेन आने का समय धीरे धीरे बढ़ाया जा रहा था और मैं उनींदा सा एक बेंच पर बैठा ऊंघ रहा था ।अचानक रेलवे पुल पर एक सुन्दर नवयौवना आती देखकर मेरी नींद एक झटके में गायव हो गयी और मैं मिलेट्री जवान जैसा तनकर बैठ गया ।और उस के आने का इंतज़ार करने लगा ।प्रत्येक कदम पर मेरी उत्सुकता बढ़ती जा रही थी ।
    मेरी किस्मत इस बात पर टिकी थी कि वो पुल से उतरकर राईट मुड़ती है या लेफ्ट ।पर ये क्या मेरी किस्मत तो शुरुआती दौर में ही दगा दे गयी ।पर मैं किस्मत के सहारे बैठे रहने बालों में से नहीं था इसलिए मैंने झट से अपना बैग उठाया और लपककर उसके पीछे हो लिए ,आखिर इतनी गर्मी में वो ही मेरा ग्लूकॉन् डी थी जो मुझे चार्ज रख सकती थी । मैं धीरे से उसके बैठने के नजदीक स्थान पर शिफ्ट हो गया ।और उसका अटेंशन पाने के लिए लव गुरु के बताये गुर अपनाने लगा । उसे देख देख कर मैं भविष्य के सपनों में खोता चला जा रहा था। एक आदर्श जीवन साथी में जितने गुणों की कल्पना मैंने अभी तक की थी वो सब मुझे उसमे दिख रहे थे ।मैंने अभी तक 50 लड़कियां रिजेक्ट की थी और 35 साल का हो जाने के बाद भी अपने मानकों से कभी समझौता नहीं किया था ।
      मुझे उसके अगल बगल बैठे सब यात्री दुश्मन नजर आ रहे थे मन कर रहा था कि दो को उठा के पटरियों पर फेक दूँ और उसका सानिध्य प्राप्त कर लूँ पर अपना मरियल शरीर देखकर चुप रहने में  समझदारी दिखी ।खैर 1 घंटे बगुला भगत जैसी तपस्या में उसनेँ मुझे दो तीन बार देखा तो मेरे दिल की धड़कन वेकाबू सी हो गयी।
     ट्रेन के आने की सूचना हो गयी थी पर अभी तक ये पता ना चला की उसे जाना किधर है। वो  बड़ी निश्चिन्त सी बैठी थी ,जैसे उसको जाना ही ना हो और उसकी निष्क्रियता से मेरा दिल बैठा जा रहा था ।मैंने निर्णय किया कि जाऊंगा तो उसी ट्रेन से जिससे ये जायेगी भले ही मुझे अपनी ट्रेन छोड़नी पड़े।तब तक ट्रेन प्लेटफ़ॉर्म पर आ चुकी थी मेरी निगाह ट्रेन की बजाय उन पर थी खैर आज खुदा हम पर मेहरवान था उसने जैसे ही अपना बैग उठाया हमने सचिन तेंदुलकर की तरह मुँह ऊपर उठाकर ऊपर बाले का शुक्रिया अदा किया और उसके पीछे हो लिए ।डिब्बा खचा खच भरा था पर हमने जबदस्ती दो सीटों पर कब्ज़ा कर लिया और उसका सीट तक आने का इंतज़ार करने लगे ताकि सफ़र और मुलाकात आसान हो जाए पर ये क्या सामने बाले अंकल जी ने उठकर अपनी सीट उन्हें दे दी ।मन में आया कि बुढऊ की खोपड़ी फोड़ दूँ फिर उनकी उम्र का लिहाज़ कर उन्हें माफ़ कर दिया।बगल से खड़ा पहलवान फिर चिल्लाया कि कौन है तेरे साथ जिसके लिए सीट कब्ज़ा किये है अब तो ट्रेन भी चल दी ।मैंने खिसककर वेमन से उसे जगह दे दी ।
    ट्रेन चल पड़ी ।मेरी निगाह उस पर टिकी थी पर वो नजरेँ झुकाये थी एक बार नजर मिलने के इंतज़ार में मेरा धैर्य टूटता जा रहा था ।
      अंकल जी ने उम्र का फायदा उठाते हुए बातचीत का सिलसिला शुरू कर दिया तो पता चला कि उसके पापा भी साथ में है और दरवाजे के पास ही खड़े है अभी बी ए के एग्जाम दिए है और अपनी बहन के यहाँ जा रही है ।मेरी निगाह अब अपने भावी ससुर को तलास करने लगी पर कई बार चेहरा मिलाने और अनुमान करने के बाद भी उन्हें पहचान ना सका ।मेरी धड़कने बढ़ती जा रही थी बी पी भी 200 पहुच चूका था निगाह मिलन की आश में चेहरा भी लाल हो रहा था अंकल जी शायद समझ चुके थे सो मेरी तरफ देखकर बोले कि तबियत ख़राब है बेटा? उनके प्रश्न से ऐसा लगा कि मैं भरे चौराहे लड़की छेड़ता पकड़ा गया ,मेरी जबान हकला गयी और बमुश्किल बोल पाया "नहीं तो "।पर इस सवाल जबाब में हमारी निगाहें चार हो गयी ।और अपनी सफलता पर मैं मुस्करा उठा पर ये क्या वो तो अपना सामान उठाने लगी ।क्या यही उतरेगी सोचकर मैं भड़ भड़ा गया ।समझ में नहीं आ रहा था क्या करूँ ,अभी तो नाम भी पता नहीं चला है।कहाँ रहती है ?क्या करती है ?जाति विरादरी क्या है ?मेरे सभी अनसुलझे प्रश्नो के उत्तर दिए बगैर वो अपना सामान लेकर ट्रेन के दरवाजे पर पहुँच चुकी थी मैं अपनी जिंदगी हारकर चुपचाप अपनी जान जाते देख रहा था ।
    खैर मैंने उसे विदा करने का अंतिम साहसिक निर्णय किया और डिब्बे के गेट पर पहुच गया ।ट्रेन रुकी और वो उतर गयी मैं इंतज़ार करता रहा कि शायद वो पलट कर देखे और मैं हाथ हिलाकर बाय कर लूँ ।पर ऐसा कुछ ना हुआ ,ना तो वो पलटी और ना ही डी डी एल जी फ़िल्म की नायिका की तरह उसने दौड़ लगायी।
    मेरी प्रेम कहानी का अंत 15 मिनट के सफ़र में ही हो गया ।और उसके जाने के बाद मुझे याद आया कि मैंने अपना बैग तो स्टेशन पर ही छोड़ दिया है ।

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