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चलो नये विहान को

नये विहान को चलो,
चलो नये स्वराज को।
नवीन राग छेड़ दो,
गढ़ो नवीन साज को।
विचार रूढ़ त्याग दो,
डरो न तख़्त ताज को।
नवीनता विचार की,
सुधारती समाज को।
- निर्दोष कान्तेय
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काव्य विधा- पञ्चचामर छंद
शिल्प- चार चरण का छंद, सभी चरण तुकांत।
प्रत्येक चरण में 'लघु गुरु' आठ बार
(1+2)×8

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