आधुनिक प्रेम
आधुनिक प्रेम
ऐसा पावन प्रेम अब, डंक ततैया हाय।
कोई खाई में मिले, कोई पीपा समाय॥
मीठे-मीठे प्यार में, बेचैन हुआ समाज।
गरल मिला है दाल में, तकिया तले है नाग॥
होंठ दबा गिरगिट हँसे, मन ही मन पछताय।
रंग बदलना सीखकर, मनुज मुझे हराय॥
विषधर का विष रक्त में, करता असर विशेष।
अब तो मानव बोलते, विष से भी कटु वेश॥
जैसे बुद्धि बढ़ती गई, उन्नत हुआ समाज।
अपने में परिपूर्ण सब, करते स्वयं पर नाज़॥
नर-नारी का भेद मिटा, अधिकार हुए समान।
कौन किसी की सुन रहा, कौन रखे सम्मान॥
दामिनी ने निशा हरी, जगमग सारा आज।
हृदय-बीच कालिमा बसी, कैसे बने समाज॥
सत्य खड़ा है मौन अब, झूठ करे गुणगान।
धन के आगे बिक रहा, मानव का ईमान॥
दया, धर्म, विश्वास सब, बन बैठे व्यापार।
स्वार्थ-सिंहासन पर चढ़ा, कैसा यह संसार॥
मुख पर मधुर मुस्कान है, भीतर जलते शूल।
स्वार्थ-सुगंधि ओढ़कर, भूल गया सब मूल॥
जाति-पाँति की आग में, जलते देखे गाँव।
मानवता रोती रही, किसको दें अब ठाँव॥
लोभ-मोह के जाल में, उलझा सारा लोक।
प्रेम, दया, विश्वास सब, सहते प्रतिदिन शोक॥
जागो मानव! त्याग दो, छल-कपट अभिमान।
सत्य, प्रेम, सद्भाव से ही, महकेगा यें हिंदुस्तान॥
✍️
विनोद कुमार वर्मा(स.अ.)
पू. मा. वि. बरसैनी, पिपराइच
गोरखपुर, उत्तर प्रदेश
📞7355037440
कोई टिप्पणी नहीं