कुछ यूँ ही...
कुछ यूँ ही...
काँच के दिल हैं यहाँ, पत्थरों के शहर हैं,
अमृत समझ के पी गए हम, जो मीठे से ज़हर हैं ।
होंठों पे झूठी हँसी, दिल में कपट का गुबार है,
इंसानों के सीने में अब, बचा न कोई एतबार है।
स्वार्थ के तराज़ू में, तौलते हैं सच्चे प्यार को,
मतलब निकल गया तो, भूल गए व्यवहार को।
रिश्ते तो बन गए हैं, बस एक दिखावा यहाँ,
अपनों की भीड़ में भी, तन्हा है अपना कारवाँ।
मीठी-मीठी बातों का, बिछाते हैं जाल ये,
मुखौटों के पीछे छिपे, रखते हैं गंदे ख़याल ये।
रूह को निचोड़ कर, कैसे मुस्कुराते हैं लोग!
इंसानियत को लगा, स्वार्थ का ये कैसा रोग।
जहाँ वफ़ा की आस थी, वहाँ ख़ंजर ही मिले,
काँटों भरे बबूल ही, हर मोड़ पर खिले।
आँखों के आँसू भी अब, पानी से लगते हैं,
झूठे इंसानों के शहर में, सच बोलने से भी डरते हैं।
सीख लिया हमने भी अब, ख़ामोश ही रहना,
ग़ैरों से क्या शिकवा, जब अपनों को ही था छलना।
मर गई संवेदनाएँ सब, सुन्न हुआ ये जहाँ,
ढूँढती हैं आँखें मगर, सच्चा इंसान है कहाँ ?
चमकते चेहरों के पीछे, काले यहाँ लिबास हैं,
गले से जो लगाते हैं, वही बनते विनाश हैं।
दिखावे की इस दुनिया में, हर रिश्ता व्यापार है,
जहाँ सिर्फ़ मतलब का, झूठा ही बस प्यार है।
अश्कों को पोंछने का, जो ढोंग रचाते रहे,
वही दर्द के ज़ख़्मों पर, नमक भी छिड़काते रहे।
मासूमियत को छलना ही, इनका ईमान है,
पत्थर से भी ज़ालिम आज, काँच का इंसान है।
आस्तीन में साँप पाले, अपनों के शबाब में,
हर लम्हा ज़हर घोला, सपनों के हुबाब में।
दिखावे की हमदर्दी का, जो नाटक रचाते हैं,
ज़िंदा इंसान को रोज़, अंदर से मार जाते हैं।
होंठों पे दुआएँ और, दिल में ख़ंजर रखते हैं,
झूठी इस दुनिया के लोग, कई कई मंज़र रखते हैं।
भरोसा जिसकी चौखट पर, दम तोड़कर सो गया,
अपनों के ही फ़रेब में, इंसानियत को खो गया।
बनावटी रिश्तों का ये, बाज़ार सजाकर बैठे हैं,
सच्चाई की लाश पर, जो जश्न मनाकर बैठे हैं।
रूह की चीख़ भी जिनको, संगीत सी लगती है,
इंसानों की बस्ती में अब, हैवानियत ही सजती है।
हैवानियत ही सजती है...
हैवानियत ही सजती है...!
✍️
कोई टिप्पणी नहीं