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भाव

भाव

सोचूँ निहारूं अपलक मैं,
दिखती निकट ये दासता।
अवरुद्ध श्वांस हो रही है,
चीत्कार करती ममता।
 
बेड़ियां जकड़ी हुई है,
रक्त रंजित पांव से।
बेबसी लाचारी में है,
जीवन की कुछ साधना।
 
दृग खोल मानव देख तू,
जीवन तेरा अनमोल है।
बाधाएं कितनी भी हों,
शशक्त कलम की ठोर हो।

उड़ान भरने की जो चाहत,
पांव थकने ना दे कभी।
हो लेखनी की पूर्णता तो,
जीत जाएंगे सभी।
  
लख  चित्र हृदय विदारक,
कुछ रुक गई है लेखनी।
फिर भी प्रबल विश्वास को लख,
मन की गाथा हमने कही।
अश्रु पूरित नयन मेरे,
पीड़ा को करते व्यक्त हैं।
फिर भी करू मैं प्रार्थना,
बेड़ी से कभी भी ना निः शक्त हों।
कभी नहीं निः शक्त हों।

✍️
ममता प्रीति श्रीवास्तव ( शिक्षिका)
  गोरखपुर,उत्तर प्रदेश।

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