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तय है मंजिल पाना

तय है मंजिल पाना
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कूद पड़ी हैं
आंदोलन में
मिलकर सारी कलमें

उठो चलो अब
बिगुल बजा
धिक्कार है बैठे रहना
कायरता ही
कहलायेगी
मौन यहाँ सब सहना

आज दिखा दो
ताक़त कितनी
है एका के बल में

रख हाथों पर
हाथ यहाँ कब-
कोई कुछ पाता है
कर्मभूमि पर
अपना जीवन
संघर्षों की गाथा है

अबकी बार
नहीं है पड़ना
यहाँ किसी के छल में

राह भरी हों
काँटों से पर
हमने है अब ठाना
कदम बढ़ाते
जाएँ हमसब
तय है मंजिल पाना

दृढ़निश्चय के
दम पर ही-
इतिहास बदलता पल में


रचनाकार
योगेन्द्र प्रताप मौर्य,
प्राथमिक विद्यालय मंगरा,
बरसठी,जौनपुर।



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