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अँधेरा ही तो है

हर तरफ अँधेरा है,
क्या हुआ प्रभात की आहट है।
इसी अँधेरे ने जाने कितनी कलियों को संवारा,
कितनी सीप में मोतियों का सृजन किया,
कितने ख्वाब आँखों में उतारे,
क्या हुआ ये अँधेरा ही तो है।
चमकती सुनहरी धूप को गर्भ में रखता है,
पुष्प और विहग की चहचाहट सुनता है,
तन और मन की सारी व्यथा तनाव समेट लेता है,
क्या हुआ ये अँधेरा जो है।
दो दिलों के मिलने से उपजे प्रेमपुष्प का गवाह है,
हर जीवन के बीज रोपण, सृजन और पोषण की आवाज है,
इसने तन्हाई और उदास मनः स्थिति को देखा है,
कभी उजले मन पर उकेरती प्रेम पंक्ति की सकुचाहट है इसमें,
क्या हुआ जो अँधेरा है ये।
उम्मीद चाँद और सितारों की इसी से है,
चाहत और नूर को पहली घूघट में देखा है इसने,
क्या हुआ अँधेरा ही तो है।
बस सोचना प्रभात का साथ मिलने वाला है,
इसी की आहट है अँधेरा।

रचयिता
प्रभात त्रिपाठी गोरखपुरी 
(स0 अ0) पू मा विद्यालय लगुनही गगहा,
गोरखपुर 
(9795524218)

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