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रिक्शावाला

रिक्शावाला


उम्र अभी उन्तालीस थी

स्थिति बड़ी भयावह थी

आंखें धंसी, गाल पिचके

लूंगी में पैबंद लगे थे

कमर झुकी हुई थी

खांसते, खखारते जीवन को ढोे रहा था

जवानी में ही बूढ़ा नजर आने लगा था

खाल में हड्डी दिखता था

कंकाल तंत्र का मॉडल था

खबर नहीं सत्तासीनों को

न अफसर और नेताओं को

इनके हक भी मार रहे हैं

और सबको समझा रहे हैं

क्या कर सकते हैं हम नियति के आगे

सबका अपना अपना प्रारब्ध है

यही बताते हैं सबके धर्म।

✍ रचनाकार
डॉ0 अनिल कुमार गुप्त,
प्र०अ०, प्रा ०वि० लमती,
बांसगांव, गोरखपुर


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