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नारी


तुम श्रद्धा हो
तुम पालन हो
तुम आदि शक्ति
तुम सृष्टि रूप
तुम ही हो विद्या देवि रूप
तुम ही हो सृजन सजगता हो
तुम मंदिर का पावन स्वरूप
तुम घर की दिव्य शुभगता हो
सृंगार तेरा अनुपम ठहरा
वात्सल्य बना पर्याय तेरा
देता है शक्ति प्रबलता जो
ऐसा क्षण क्षण आशीष तेरा
व्रत खुद के लिए नही होते
बन ढाल पुरुष को हैं सेते
तुम जननी हो
तुम अवनी हो
कण कण में फैली तरनी हो
तुम मीरा हो तुम पन्ना हो
तुम राधा हो चेन्नमा हो
अनुसूइया जैसी साधक तुम
शबरी जैसी आराधक तुम
सीता बन तुमने त्याग किया
सावित्री बन पति प्राण जिया
उर्मिला अथाह विरहणी तुम
यशुदा मइया सी गृहिणी तुम
तुमको कायर कहते हैं जो
उनको उत्तर देती हैं यों
नौ मास उदर में रखती हो
तब जाकर सृष्टि पनपती हो

तेरे स्वरूप को है प्रणाम
तू ही है जैसे चार धाम।।


✍ रचनाकार
    आशीष त्रिपाठी
    स0अ0
    उ0प्रा0वि0 - मवइया
    क्षेत्र - असोथर
    जनपद - फतेहपुर

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