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पराली



फिर पराली आई है,
दिल्ली बहुत घबराई है।
सांँस लेना दुर्भर हुआ,
ऐसी आफ़त आई है।।

दिल्ली है दिलवालों की,
भारत के रखवालों की।
'अविरल' चिंता क्यों न करे,
देश में रहने वालों की।।

हवा में ऐसी घुटन समाई,
इतने हम बेचैन हुए।
अंधा 'धुंध' समाया दिन में,
दिन ही मानो रैन हुए।।

कोई तो ऐसा बिंदु हो,
जिस पर हम सब एक हों।
राजनीति की बात छोड़,
नीति एक विशेष हो।।

आओ कुछ निष्कर्ष निकालें,
विकल्प जहांँ अनेक हों।
धरा को कर दें हरा-भरा,
संकल्प में हम अतिरेक हों।।

✍️अलकेश मणि त्रिपाठी "अविरल"(सoअo)
पू०मा०वि०- दुबौली
विकास क्षेत्र- सलेमपुर
जनपद- देवरिया (उoप्रo)

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