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डिप्टी साहब

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   गुरु जी अपनी ड्यूटी के प्रति बहुत ईमानदार थे। समय से स्कूल जाना, संचालित करना, पढ़ाना, खेलकूद तथा अन्य गतिविधियों में हमेशा सक्रिय रहते थे।
       आज किसी कारणवश देर हो गए थे। आ ही रहे थे कि रास्ते में किसी ने कहा...गुरुजी स्कूल पर डिप्टी साहब आए हैं, और आपको पूछ रहे हैं।
गुरु जी की साइकिल कुछ डगमगाई लेकिन धीरज से काम लिए और सारा ध्यान और बल ब्रेक पर लगा जल्दी से साइकिल से उतरे.......
   
साइकिल वहीं पटककर घबडा़ते हुए बोले.........
       चिंटुआ....
बेटा एक लोटा लाउ त...
का होई गुरु जी.? उत्सुकता वश चिंटू बोला।
अरे लाऊ बेटा..... अभी बतउले के समय नाही ह.... बाद में बताइब।
चिंटू घर में से लोटा ला गुरु जी को देता है।
चुटकी लेते हुए चिंटू फिर पूछता है...का बात है गुरुजी जी.....  ई समय लोटा क जरुरत पड़ गवा।
चल हट किनारे...हर समय क्वेश्चन नाही     करे के चाहीं....गुरुजी झिड़कते हुए कमीज निकाल धोती को गले में डाल स्कूल के नल की ओर बढ़े....
तभी.......
आप विद्यालय लेट आ रहे हैं?..और हां यह क्या हुलिया बना रखा है? ऐसे कोई आता है क्या? डिप्टी साहब मास्टर साहब की ओर मुखातिब हो बोलो।
का करैं.... क्या करैं.... जान दे दें.... हैं.. ह्यां......  अभी हाथ थोड़ा धोये ही थे कि फिर से लोटे में पानी भरकर खेत की ओर दौड़ लगा दिए...
डिप्टी साहब को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि माजरा क्या है।
वापस आने पर डिप्टी साहब पुनः पूछ बैठे।
कहाँ थे अबतक ?
आग की तरह फइलत बा आग की तरह सबके चपेट में ले लेत बा देखत बाटीं केहु ना बची केहु ना..... घर से निकले थे हम भी पूरी तरह स्वस्थ थे रस्ते में आते ही हमहूं शिकार हो गइलीं..... हांफते हुए गुरु जी बोले।
पूरी बात बताइए.....पूरी बात बताइए मास्टर साहब ! गुस्साते हुए डिप्टी साहब बोले।
गांव में हाहाकार मचा है...चारों ओर रोना पिटना मचा है....महामारी फैल गवा है। गाँव में हैजा फैल गवा है। त्राहि त्राहि मची है।
आप किस रोड से आये हैं? बेहद गंभीर भाव से गुरु जी ने पूछा।
और कुछ अभी गुरु जी आगे पूछते उसके पहले ही डिप्टी साहब के चेहरे का रंग बदल गया था। घबड़ाहट मुखमंडल के तेज को फीका कर दिया था।
मुझे तो एक मास्टर साहब स्कूटर से मेन रोड से लाये हैं।.... क्यों क्या हुआ ?
मेन रोड से......
मास्टर साहब अपनी आँखों का व्यास बढ़ाते हुए.......
हूंअ्अ्.....
अब मत जाइएगा उस रस्ते से......उधर लाशें बिछने की नौबत आ गई है।
डिप्टी साहब के पांव में अब कंपन होने लगा था चेहरे पर पसीना साफ झलक रहा था, बोले...इधर कोई अन्य सुरक्षित रास्ता है क्या?
हां हां है .....तपाक से कुर्ता पहनते हुए बोले...... ले..किन..... जाएंगे कैसे?
बिना स्टैंड के दीवार से टिकाए साईकिल की ओर इशारा करते हुए डिप्टी साहब बोले.. यह साईकिल किसकी है?
गुरु जी समझ गये... और ज्यादा समय भी नहीं लेना चाहते थे.... चपरासी से बोले....
भोलवा... साहब के बैठा के पीछे वाले खड़ंजा के रास्ते चौराहे पर पहुँचा दे।
भोला अभी तैयार हो ही रहा था तबतक डिप्टी साहब सरपट साइकिल के पास पहुंच गये।
एक मिनट रुकिए साहब.... प्लीज....
जरा रजिस्टर पर seen signature कर दीजिए आये हैं तो इतना तो कर ही दीजिए.... रजिस्टर लेकर गुरु जी दौड़ते हुए डिप्टी साहब की ओर आ रहे थे।
ठीक है... ठीक है.... संकुल पर भिजवा दीजिएगा... हम बाद में देख लेंगे बिना पिछे देखे हाथ ऊपर की ओर हिलाते हुए भोला को जल्दी से आगे बढ़ने के लिए इशारा करते हुए डिप्टी साहब बोले।
भोला भी डिप्टी साहब को साइकिल के  कैरियर पर बिठाकर पैडल से साइकिल को तूफान मेल की रफ़्तार दी और खड़ंजे की ओर हैंडल को दिशा दी। डिप्टी साहब के लाख कहने पर कि अरे भोला हम कमर में बेल्ट लगा के रहते हैं पर भोला कहाँ मानने वाला था....गुरु जी का आदेश जो था।
गुरुजी की सांसो में जो अबतक केवल ऊपर की ओर चल रही थी,डिप्टी साहब के आंखों से ओझल होते ही निरंतरता आई, मानो आज उन्होंने अपनी पूरी सेवा बचा ली।

डॉ०अनिल गुप्ता
प्रधानाध्यापक
प्राoविoलमती
विकास खंड-बांसगांव
जनपद-गोरखपुर



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