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तोता

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एक बार देवलोक में एक देवदूत को किसी बात पर सजा मिली और उसे तोता बना कर कष्ट झेलने के लिए पृथ्वीलोक में वास करने के लिए भेज दिया गया।
विधि ने पहले ही कुछ ऐसा लिखा था की जिस दिन वह अंडे से बाहर निकला उसके आठवे दिन तेज आँधी चली और वह अपने घोसले से नीचे गिर पड़ा।
पर मृत्यु उसके भाग्य में नही था,
..वह इक लुहार की बीवी के को मिला और उसने उसे अपना लिया।
यद्यपि तोता अपने जन्म के पश्चात यह भूल गया की वह देवदूत है तथापि उस की देवदूत सरीखी कुशलता गयी नहीं। वह जल्द ही लुहार के घर का सदस्य बन गया। वह बातें रटकर नही बोलता, वह अपने चातुर्य के बल पर सबका प्यारा था।
लुहार के ग्राहक आते वह उनसे उनकी प्रशंसा करता। वह लुहार के कर्मठी होने की बातें बताता। वह बताता की कितनी मेहनत से वह औजार बनाता है और उसके औजारों में मजबूती होती है।
वह केवल उन्ही बातो को बताता जो सत्य होती और प्रिय होती। अप्रिय सत्य वह कभी नही कहता। वह देवदूत था।
लुहार की आमदनी बढ़ने लगी, गाँव से किसान औजार खरीदने आते और साथ ही तोते से बातें भी करते। लुहार की बीवी और बच्चे भी खुश रहते। लुहार भी अपनी बढ़ी कमाई से खुश रहता। वह और भी तल्लीनता से कार्य करता। _अब वह ज्यादा हंसमुख और खुशमिजाज था।_ वह अक्सर किसानो के छोटे बच्चों को छोटी छोटी खुरपी भेंट किया करता। उसके इस स्वभाव से किसानों के मन में उसके प्रति प्रेम पनपने लगा। लोग अपने साथ किये गए अच्छे व्यवहार भले भूल जाएँ पर अपने बच्चों के साथ हुए अच्छे व्यवहार कभी नही भूलते लुहार को पता भी नही चला की किस तरह एक तोते की मीठी और सकारात्मक बातों ने उसके जीवन में परिवर्तन ला दिया है। अब वह खुश था क्योंकि वह प्रगति कर रहा था, वह प्रगति कर रहा था क्योंकि वह खुश था।
दिन बीते, लुहार ने एक छोटा सा कारखाना खोल लिया, उसने कुछ मज़दूर भी रख लिए। अब वह सिर्फ लुहार नहीं था,अब वह एक मालिक था।
वो तोता, जो एक देवदूत था, जिसने लुहार की ज़िन्दगी बदल दी, उसकी सजा समाप्त हुई और वह मृत्यु को प्राप्त हुआ। उसकी ज़िन्दगी बेहद छोटी थी क्योंकि देवदूत ऐसे ही ज़िन्दगी में आते हैं और चले जाते हैं और इनकी उम्र भी कम होती है क्योंकि अच्छे प्राणी की आवश्यकता इंसान को ही नहीं, देवताओं को भी पड़ती है।
वह तोता जो देवदूत था उसे अपनी पुरानी स्थिति नही पता थी की वह कभी देवदूत था। उसने एक तोते के जीवन को अपना लिया। वह सन्तुष्ट रहा क्योंकी वह भूल गया की उसकी पिछली ज़िन्दगी कितनी महान थी।
तोते की मृत्यु ने लुहार के परिवार को अत्यंत दुखी कर दिया। उन्होंने उस तोते को अपना भाग्य मान लिया था ,वह भूल गए थे की उन्होंने जो भी कुछ पाया है वह उन की मेहनत थी। वह कर्मठी थे पर उन्होंने भाग्य को अपना सब कुछ मान लिया था। उनके दुःख ने उनके काम को प्रभावित किया। उनके मजदूर उनसे नाखुश रहने लगे। धीरे धीरे उनका व्यापार उनके अवांछित दुःख और अतिभाग्यवादिता के कारण टूटने लगा।
इन स्थिति को ठीक करने के लिए लुहार की बीवी ने बाज़ार से एक तोता खरीद लिया, तोता देवदूत नही था पर एक सामान्य तोते सा था। वह कुछ रटे रटाये शब्द बोलता, वह ग्राहकों का अभिवादन करता, अपने मालिक के नाम जपता, कुछ गीतों के धुन गाता और मज़दूरों को काम करने के लिए डाँट लगाता,वह सबकुछ करता जो उसे सिखाया गया था या उसने सीख लिया था, वह बिलकुल सामान्य और अच्छा तोता था पर वह देवदूत नही था।
लुहार के परिवार वाले अपने पुराने तोते के प्रेम में इस कदर बंधे थे की उन्हें ये नया तोता रास नही आता। वह अक्सर उसकी आवाज़ से चिढ़ जाते। लुहार उस तोते को अपना भाग्य नही मान पा रहा था। *वह दुखी था क्योंकि असन्तुष्ट था, वह असन्तुष्ट था क्योकि उसकी उम्मीद ज्यादा थी।
धीरे धीरे समय बीतता गया, न वह नया तोता पुराने तोते सा बन पाया और न ही लुहार उसे पुराने तोते की तरह अपना पाया। अब धीरे धीरे वह चिड़चिड़ा होने लगा। उसकी चिड़चिड़ाहट की वजह से मज़दूर और ग्राहक दोनों असन्तुष्ट रहने लगे और उसका व्यापार डूब गया।
अंततः लुहार क़र्ज़ में डूब गया और उसके पास अब वो भी नहीं रहा जो उसके पास तब हुआ करता था जब वह देवदूत तोता उसके पास नही था।
मैं अपनी कहानी को यहीं विराम देता हूँ, क्योंकि मैं अपनी कहानी में लुहार के साथ इससे अप्रिय घटित होते हुए चित्रित नही करना चाहता।

अंततः

●ज़िन्दगी में संगत बहुत ही अहम् किरदार निभाती है। यदि हमारे आस पास कोई सकारात्मक शक्ति है तो वह देवदूत के समान है।
●वो जो देवदूत के समान होते हैं वो सदैव आपके साथ नही रह सकते, एक दिन वह भी आपको छोड़ जायेंगे।
●अपने कर्मठी स्वभाव को नही छोड़ना चाहिए, ये आपका भाग्य नहीं जो आप को ऊँचा बनाता है, ये आपका सकारात्मक रवैया और कर्मठी स्वभाव है।
●अधिक अपेक्षा और अधिक की इच्छा अक्सर लोगो तब डुबो देती है जब वो इनकी वजह से दुखी रहने लगते हैं।
●सबके भाग्य में तोता नही होता, खुश रहना और अपने काम में तल्लीन रहना खुद ही सीखना पड़ता है।


यशो देव रॉय
विद्यालय - पू0मा0वि0 नाउरदेउर
ब्लाक-कौड़ीराम



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