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बचपन याद आता है

"बचपन याद आता है"


नीम की छाँव में बीता,
बचपन याद आता है।
आम के बागीचों में,
गुलेल से अमिया गिराना याद आता है।।


वो शरारतें वो लड़कपन,
बाबा की लाठी छुपाना याद आता है।
खाने के बाद बत्तीसी निकाल बैठी,
दादी को पोपला कह चिढाना याद आता है।।


टॉफियों के मेहनताने में पिघलना,
वो दौड़ भाग के काम करना याद आता है।
डांट फटकार से बहुत करीबी सा रिश्ता,
एक पल रोना दूजे पल खिलखिलाना याद आता है।।


जहां बचपन गुजारा था, वहाँ फिर जाना हुआ था,
मोहल्ले के घर, घर की दरों दीवार सब देख आया हूँ।
सब कुछ जैसा नया ताजा हुआ है,
मैं उन यादों को दिलो-दीमक पर समेट लाया हूँ।।



✍ रचयिता
अभिषेक द्विवेदी "खामोश"
प्राथमिक विद्यालय मंनहापुर 
सरवनखेड़ा कानपुर देहात।



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