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रिश्ते


आकाश सजा है तारों से
उद्यान सजा है बहारों से
रिश्तों से सजता है जीवन
आनंदित प्रेम फुहारों से

रिश्तों को वो ही समझे
जिन्हें निभाना आता है
लदी फलों से हो डाली
तो वृक्ष स्वयं झुक जाता है

बन जाते हैं आसानी से
निभने में भी आसान ही हैं
पर अहम भाव जो आया तो
रिश्ते ही शमशान भी हैं

जीवन का भवन बनाना हो तो
आधार बना करते रिश्ते
जीवन की नैया खेनी हो तो
पतवार बना करते रिश्ते

बुनियाद में गर हो स्वार्थ लगा
तो व्यापार हुआ करते रिश्ते
सुंदर कविता से सुर हों लय हो
तो प्यार बना करते रिश्ते

रिश्तों के रिश्ते ऐसे हैं
जिनका रस्ते बेढंगे हैं
तन पर हो जेवर पर प्रेम नही
वे सजे धजे भी नंगे हैं

रिश्तों के बंधन ऐसे हैं
जिनका बिंधन आसान नहीं
क्षण भर में टूट जाएं अगर
उन रिश्तों में थी जान नहीं

एक नहीं कई जन्मों का
है तेरा मेरा यह रिश्ता
आने जाने का जग में चक्कर
रिश्तों में रहती स्थिरता!


✍ रचनाकार
     जय शेखर
     प्रा0वि0 धुसाह-1
     बलरामपुर

2 comments:

  1. संबंध कोई भी हो लेकिन, यदि दुख में साथ ना दे अपना; फिर सुख में इन संबंधों का, रह जाता कोई अर्थ नहीं|

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